navratri me kalash sthapna, नवरात्र में कलश स्थापना 2026, Navratri 2026,

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navratri me kalash sthapna, नवरात्र में कलश स्थापना,

हे माँ आदि शक्ति आप अपने भक्तो पर सदैव अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखते हुए उनकी समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करे ।

नवरात्री में कलश स्थापना Navratri me kalash sthapna का बहुत महत्व है। नवरात्रि Navratri की प्रतिपदा के दिन सभी भक्त श्रद्धानुसार अपने घर / कारोबार में घट अर्थात कलश स्थापना, Kalash sthapna करते हैं।

शास्त्रो के अनुसार शुभ मुहूर्त Shubh Muhurat एवं विधि विधान से नवरात्र में कलश स्थापना करने, Navratri me kalash sthapna से माँ अति प्रसन्न होती है।

कई बार ऐसा देखा जाता है कि भक्त पूरी श्रद्धा से माँ की आराधना करते है लेकिन उन्हें कलश स्थापना Kalash sthapna की सही विधि नहीं मालूम होती है, यहाँ पर हम आपको कलश स्थापना Kalash sthapna की आसान विधि बता रहे है,

नवरात्र में कलश स्थापना कैसे करें, navratri me kalash sthapna kaise karen,

* नवरात्र के प्रथम दिन शुभ मुहूर्त Shubh Muhurat में घर के मंदिर में अथवा घर के ईशान कोण या पूर्व दिशा में लकड़ी की चौकी पर लाल अथवा पीले वस्त्र बिछाकर उसके ऊपर माँ दुगा की मूर्ती या तसवीर को स्थापित करना चाहिए।

* प्रतिपदा के दिन सुबह शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना, Shubh Muhurat me Kalash Sthapna के लिए सबसे पहले जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र लें, इस पात्र को स्थापित करने से पहले इसके नीचे सप्तधान्य बिखेर दें I

फिर इस पात्र में मिट्टी की एक परत बिछाकर फिर एक जौ की परत बिछाएं।
इसके ऊपर फिर मिट्टी की और उसके बाद एक परत जौ की बिछाएं ततपश्चात उसको जल से अच्छी तरह से गीला करके उसके पश्चात उसपर सोने, तांबे अथवा मिट्टी के कलश की विधिपूर्वक स्थापित करें।

* (इस बात का विशेष ध्यान दे कि जो कलश आप स्थापित कर रहे है वह मिट्टी, पीतल , तांबा, चाँदी या सोने का होना चाहिए। लेकिन लोहे या स्टील के कलश का प्रयोग बिलकुल भी प्रयोग नहीं करे ।)

कलश को गंगा जल से भरकर उसमें पंचरत्न, रोली, मीठा, चाँदी का सिक्का डालकर उसपर आम के पत्ते लगाकर कलश को ढक्कन से ढक दें।

* फिर उस ढक्कन में अक्षत भरकर उसपर जटा वाला नारियल किसी लाल चुनरी में कलावा से लपेटकर उस पर रख दें । कलश के कंठ पर मोली अवश्य ही बाँध दें।

इस बात का विशेष ध्यान दे की कलश kalash पर रखे नारियल का मुँह किस ओर हो…….

कलश के ऊपर जो नारियल रखा जाता है उसे भगवान गणेश का प्रतीक भी माना जाता है,

नारियल का मुँह उस तरफ होता है, जिस ओर से वह पेड़ की टहनी से जुड़ा होता है। शास्त्रनुसार नारियल का मुख नीचे की तरफ रखने से शत्रु में बढ़ते है।
नारियल का मुख ऊपर की तरफ रहने से रोग प्रबल होते हैं, नारियल का मुख पूर्व की तरफ रखने से धन की हानि होती है।
लेकिन नारियल का मुख साधक की तरफ रहने से शुभ फलो की प्राप्ति होती है,
इसलिए नारियल का मुँह सदैव भक्त की तरफ ही होना चाहिए।

* इसके पश्चात् सभी देवी देवताओं का कलश में आवाहन करें। “हे माँ दुर्गा और सभी पूज्य देवी देवता आप सभी नवरात्र Navratri के इन नौ दिनों के लिए हमारे यहाँ पर पधारें।” इसके पश्चात् दीपक , धूप, अगरबत्ती जलाकर माँ की तस्वीर एवं कलश का पूजन करें। फिर माँ को फूल, माला, लौंग इलायची, नैवेद्य,पंचमेवा, इत्र, शहद, फल मिठाई आदि भी अवश्य ही अर्पित करें ।

* नवरात्र Navratri के दौरान यदि हो सके तो कलश Kalash के सामने अखंड दीप भी जलाएं।
यदि घी का दीपक लगाएं तो ध्‍यान रखें कि उसे माता की मूर्ति के दायीं ओर रखें और यदि तेल का दीपक जला रहे हैं, तो उसे मूर्ति के बायीं ओर रखें।

दीपक की स्थापना करते समय ध्यान रहे की दीपक के नीचे “चावल” अथवा “सप्तधान्य” रखकर उसके ऊपर दीपक को स्थापित करें ।

दीपक के नीचे “चावल” रखने से माँ लक्ष्मी की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है तथा दीपक के नीचे “सप्तधान्य” रखने से समस्त प्रकार के कष्टों से छुटकारा मिलता है। 

नवरात्री Navratri में माँ के आगे जो दीपक जलाएं उसमें रुई की जगह यदि सूती लाल कलावे का प्रयोग किया जाय तो माँ की शीघ्र ही कृपा प्राप्त होती है इसलिए दीपक deepak की बत्ती में सूती लाल कलावे का प्रयोग करें ।

* नवरात्रे Navratre की अष्टमी या नवमी के दिन दस साल से कम उम्र की नौ कन्याओं और एक लडके को भोजन करा कर उन्हें दक्षिणा उपहार देकर उन कंजकों से उगे हुए जौ के बीच स्थापित कलश को अपने स्थान से हिलवा देना चाहिए, उसके बाद कुछ जौं को जड सहित उखाडकर घर की तिजौरी या धन स्थान पर रखना चाहिए इससे घर में स्थाई सुख समृ्द्धि का वास होता है ।

* नवरात्री के अंतिम दिन कलश के पानी को पूरे घर में छिडक देना चाहिए, इससे घर से अशुभ शक्तियां समाप्त होती है।
नारियल को तोड़कर माता दुर्गा के प्रसाद स्वरुप घर के सदस्यों के बीच में बाँट देना चाहिए।

* मिट्टी का बर्तन जिसमें जौ उगाई गयी थी उसे बची हुई जौ की घास के साथ संध्या से पहले किसी नदी में विसर्जित कर देना चहिये।

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<< जानिए नवरात्री में घट स्थापना का शुभ मुहूर्त

पं आचार्य मुक्ति नारायण पाण्डेय
( कुंडली, ज्योतिष विशेषज्ञ )

 संपर्क सूत्र: हर समस्या का समाधान आपकी कुंडली में ही है

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Published By : Memory Museum
Updated On : 2025-09-20 11:19:00 PM

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    सभी हिन्दु धर्म ग्रंथो में नवरात्री की बहुत महिमा बताई गई है । नवरात्री के नौ दिनों में भक्त गण सच्चे मन से माँ आदि शक्ति के विभिन्न रूपो की आराधना करते हुए माँ से अपने घर परिवार में आरोग्य, सुख-समृद्धि और समस्त सुखो के लिए प्रार्थना करते है।

    मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा से माँ की आराधना करते है माँ उनकी समस्त अभिलाषाएं अवश्य ही पूर्ण करती है । जो लोग इन दिनों ब्रत रखते है उन्हें पहले से ही नवरात्री की तैयारी, navratri ki taiyari, एवं ब्रत के कई नियमो का पालन करना होता है । 

    यह है नवरात्री में कलश स्थापना का सर्वोत्तम मुहूर्त, इस समय घर पर कलश की स्थापना तो माँ दुर्गा की मिलेगी असीम कृपा

    नवरात्री की कैसे करें तैयारी, navratri ki kaise karen taiyari,

    नवरात्री अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन शुरू होते है सामान्यता देखा जाता है कि नवरात्र के प्रथम दिन कलश स्थापना, जौ बोने के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त थोड़े समय के लिए ही मिल पाता है जिसमें हम जल्दी जल्दी करते हुए हड़बड़ा जाते है और कई बातो को भूल जाते है । 

    अतः  जो लोग घर में जौ बोते है उन्हें जौ बोने के लिए बर्तन एवं मिटटी की व्यवस्था एक दिन पहले ही कर लेनी चाहिए । 

    नवरात्र में पूजा सामग्री में कलश, जौ के लिए बर्तन , कलश के लिए आम के पत्ते, पंचरत्न, रोली, मीठा, चाँदी का सिक्का , जौ , तिल, , कमल गट्टा, शहद, गंगा जल, इत्र, सिंदूर, रोली, हल्दी की गाँठ, जायफल, सुपारी, पीला जनेऊ, लाल कलावा / मोली, कौड़ियाँ, पंचमेवा, मिश्री, मेवे, फल, मखाने, घी, कलश के ऊपर रखने वाला नारियल, पीले अक्षत, लकड़ी की चौकी, बिछाने के लिए लाल / पीला कपड़ा, लाल चुनरी , माँ के लिए वस्त्र, अर्पित करने के लिए सुहाग का सामान /चूड़ियाँ आदि जो भी खरीदना हो उसकी लिस्ट बना कर पहले ही खरीद कर रख लें ।  

    जिससे ऐन वक्त पर कुछ खोजना ना पड़े । पूजा के लिए पान के पत्ते और फूल / माला   भी एक रात पहले ही खरीद कर रख लेना चाहिए । 

    नवरात्री में घर के मंदिर में कलश स्थापना, जौ बोने से पहले मंदिर को अच्छी तरह से साफ करके उसे सजा लेना चाहिए । मंदिर की मूर्तियों / तस्वीरों को अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए और उन्हें वस्त्र आदि पहना देना चाहिए । 

    नवरात्री में घर, कारोबार में इस विधि से करें कलश की स्थापना, अवश्य जानिए कलश स्थापना की सही और बहुत ही आसान विधि

    अधिकतर यह देखा जाता है कि भक्त गण यह कार्य नवरात्र के प्रथम दिन ही करते है जिसमें अच्छा समय लग जाता है और स्थापना का शुभ मुहूर्त नहीं मिल पाता है अतः मंदिर की साफ-सफाई, सजावट का कार्य एक दो दिन पूर्व में ही हर हालात में कर लेना चाहिए जिससे उस दिन जल्दबाजी और भूल-चूक ना हो । 

    जिन घरो में अखंड ज्योति जलाई जाती है वहाँ पर दीपक को पाहे ही अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए, घी और दीपक को ढकने के लिए शीशे का इंतजाम भी पहले ही कर लेना चाहिए । 

    मान्यता है कि अखण्ड ज्योति में रुई की जगह लाल बत्ती का प्रयोग करना शुभ रहता है, ध्यान रहे लाल बत्ती सूती हो तभी वह लंबे समय तक जल पायेगी । दीपक के लिए सूती लाल बत्ती भी पहले से ही ले लेनी चाहिए ।  

    जो लोग नवरात्र में घर में कलश स्थापना करते  है, नवरात्री का ब्रत रखते है, उन्हें नवरात्री से पहले ही अपने घर की अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए , विशेषकर  घर के मंदिर, रसोई और फ्रिज़ को बिलकुल साफ – सुथरा रखना चाहिए । वहाँ किसी भी प्रकार का प्याज़, लहसुन आदि ना रखे । 

    नवरात्र के ब्रत में भक्त गण फलाहार, फल आदि का सेवन करते है । आजकल बाजार में भी बनी बनाई ब्रत की नमकीन मिलती है , लेकिन उससे अच्छा है कि मखाने , मूंगफली, साबुत दाना आदि लेकर पहले से ही घर पर हल्के घी / तेल की  सेंधा नमक या बिना नमक की ब्रत की नमकीन बना लें । जिससे ब्रत में भूख लगने पर बिलकुल साफ और हल्का आहार प्राप्त हो सके । 

    नवरात्र में प्रतिदिन की पूजा में माँ को कुछ ना कुछ प्रशाद अवश्य ही चढ़ाना चाहिए । यह प्रशाद पंचमेवा, मिश्री, लौंग, इलाइची, मेवे, फल आदि हो सकते है , इन्हें भी पहले से ही खरीद कर रख लेना चाहिए । 

    नवरात्री में माँ दुर्गा की स्वरूप कन्याओं की इस तरह से पूजा, अवश्य जानिए नवरात्री में कन्या पूजन की सही विधि

    नवरात्री में माँ दुर्गा को नौ दिन अलग अलग भोग लगाने का विधान है , यदि आप भी माँ को प्रत्येक दिन शास्त्रो के अनुसार भोग लगाना चाहते है तो प्रतिदिन के भोग की व्यवस्था भी पूर्व में ही समय रहते कर लेनी चाहिए ।  

    नवरात्रि में मंदिरो में भजन कीर्तन होते रहते है, बहुत से लोग अपने घर पर भी माँ की भेंटो , भजन कीर्तन का आयोजन करते है, इससे वातावरण शुध्द होता है । नवरात्र में किसी भी दिन समय निकाल कर इन कीर्तन में अवश्य ही जाएँ अथवा अपने घर पर ही किसी म्युज़िक सिस्टम में ही सही नवरात्र में माता के गीत अवश्य ही चलाएं, भक्ति रस का आनंद लें । 

    नवरात्री के दिन बहुत ही सिद्ध और शक्ति संपन्न होते है, नवरात्री के इस उपाय से मिलेगी सभी कार्यों में श्रेष्ठ सफलता, जानिए नवरात्री के अचूक उपाय

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    nav samvatsar, नव संवत्सर 2083,

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    शास्त्रों के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में जिस दिन सूर्योदय के समय प्रतिपदा हो, उस दिन से नव संवत्सर, nav samvatsar, आरंभ होता है।

    चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा के दिन से हिन्दु नव वर्ष अर्थात हिन्दु नव संवत्सर Hindi nav samvatsar की शुरुआत मानी जाती है । धार्मिक ग्रंथो में इस दिन को बहुत पुण्यदायक , शुभ एवं महत्वपूर्ण माना गया है ।

    ‘चैत्रे मासि जगद ब्रह्मा ससर्ज प्रथमे अहनि,
    शुक्ल पक्षे समग्रेतु तदा सूर्योदये सति’

     ब्रह्म पुराण में लिखे इस श्लोक के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पास के सूर्योदय पर सृष्टि के रचियता भगवान ब्रह्माजी ने इस सृष्टि की रचना की थी और इसी दिन से नव संवतसर, nav samvatsar, प्रारम्भ होता है ।

    चैत्र नवरात्र की प्रतिपदा, 19 मार्च गुरुवार के दिन विक्रम संवत 2083 का आरंभ हो जाएगा ।

    नवरात्री में घर, कारोबार में इस विधि से करें कलश की स्थापना, अवश्य जानिए कलश स्थापना की सही और बहुत ही आसान विधि

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    इस बार विक्रम संवत्सर 2083 का नाम रौद्र संवत्सर होगा, गुरुवार शुरू होने के कारण इसके राजा गुरु और मंत्री मंगल देव जी होंगे।

    शास्त्रों के अनुसार नवसंवत्सर का आरंभ जिस वार से होता है, उस वार का अधिपति ग्रह ही उस संवत्सर का राजा कहलाता है।

    चूँकि इस बार गुरुवार के दिन हिन्दू नववर्ष का प्रारम्भ हो रहा है, इसलिए इस संवत्सर के राजा गुरु बृहस्पति देव जी होंगे ।

    आज ही के दिन से नवरात्री का भी प्रारम्भ हो जायेगा इस वर्ष माँ दुर्गा हाथी पर सवार होकर आएंगी और भैसे पर सवार होकर जाएगी |

    नवरात्री के दिन बहुत ही सिद्ध और शक्ति संपन्न होते है, नवरात्री के इस उपाय से मिलेगी सभी कार्यों में श्रेष्ठ सफलता, जानिए नवरात्री के अचूक उपाय 

    शास्त्रो में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को एक स्वयं सिद्ध अमृत तिथि माना गया है । यह दिन इतना शुभ माना गया है कि शास्त्रो में उल्लेखित है कि यदि  इस दिन किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत की जाए या कोई संकल्प लिया जाए तो उसमें अवश्य ही सफलता मिलती है।

    हिन्दू पंचांग के अनुसार साल 2026 में चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 19 मार्च गुरुवार को सुबह 6.52 AM मिनट से प्रारम्भ होगी जो अगले दिन शुक्रवार को 20 मार्च को तड़के सुबह 04.54 AM तक रहेगी तत्पश्चात द्वितीया तिथि लग जाएगी, अर्थात चूंकि प्रतिपदा तिथि का हास् हो रहा है इसलिए 19 मार्च गुरुवार से ही नव संवत्सर का प्रारंभ माना जाएगा, इसी दिन से चैत्र नवरात्रि का आरंभ भी हो जाएगा I

    प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ – 19 मार्च, 2026 को प्रात: 06:52 AM बजे से

    प्रतिपदा तिथि समाप्त – 20 मार्च 2026 को तड़के सुबह 04:54 AM तक

    महाराष्ट्र में हिन्दू नववर्ष या नव-सवंत्सर के आरंभ के दिन को गुड़ी पड़वा के रूप में पूर्ण हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है।

    अवश्य पढ़ें :- इन उपायों से थायरॉइड रहेगा बिलकुल कण्ट्रोल में, यह है थायरॉइड के अचूक उपचार 

    नव संवतसर का बहुत ही धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व भी है।

    चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा के दिन ही लगभग एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 124  साल पहले भगवान ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि का सृजन किया था।

     शास्त्रो के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का राज्याभिषेक भी इसी शुभ दिन किया गया था ।

    इसी दिन से माँ दुर्गा के श्रद्धा, भक्ति और शक्ति के नौ दिन के नवरात्रो की शुरुआत होती है।

    # शास्त्रों के अनुसार सतयुग का आरम्भ भी इसी तिथि से माना जाता है ।

    # मान्यता है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही भगवान श्री विष्णु जी का मत्स्य अवतार हुआ था ।

    # चैत्र शुक्लपक्ष की प्रतिपदा अर्थात नव संवत्सर के दिन ही सम्राट विक्रमादित्य ने 2083 साल पहले अपना राज्य स्थापित कर विक्रम संवत की शुरुआत की थी।

     # नव संवत्सर के दिन ही विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने भी हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में अपना श्रेष्ठ राज्य स्थापित किया था। इसी दिन से शालिवाहन संवत्सर का प्रारंभ भी माना जाता है ।  

    #  सिंध प्रांत के प्रसिद्घ समाज सुधारक और सिंधीयो के पराम् पूजनीय वरुणावतार संत झूलेलाल इसी दिन अवतरित हुए थे ।

    # इस शुभ दिन सिख धर्म के द्वितीय गुरु श्री अंगददेव का जन्म दिवस भी माना जाता है।

     # शुभ हिन्दु नव संवत्सर के दिन ही समाज को नयी राह दिखाने के लिए प्रसिद्द समाज सुधारक और विचारक स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की थी।

     # 5128 वर्ष पूर्व युगाब्द संवत्सर के प्रथम दिन ही युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी हुआ था।

    मान्यता है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन नीम के नए कोमल पत्तों को काली मिर्च, के साथ खाने से वर्ष भर अरोग्यता रहती है।

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    मंगलवार का पंचांग, Mangalwar Ka Panchang, 17 मार्च 2026 का पंचांग,

    मंगलवार का पंचांग, Mangalwar Ka Panchang, 17 मार्च 2026 का पंचांग,


    मंगलवार का पंचांग, Mangalwar Ka Panchang,

    Panchang, पंचाग, ( Panchang 2026, हिन्दू पंचाग, Hindu Panchang ) पाँच अंगो के मिलने से बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं :-


    1:- तिथि (Tithi)
    2:- वार (Day)
    3:- नक्षत्र (Nakshatra)
    4:- योग (Yog)
    5:- करण (Karan)




    पंचाग (panchang) का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है इसीलिए भगवान श्रीराम भी पंचाग (panchang) का श्रवण करते थे ।
    जानिए मंगलवार का पंचांग (Mangalvar Ka Panchang)।

    शास्त्रों के अनुसार तिथि के पठन और श्रवण से माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है ।
    वार के पठन और श्रवण से आयु में वृद्धि होती है।
    नक्षत्र के पठन और श्रवण से पापो का नाश होता है।
    योग के पठन और श्रवण से प्रियजनों का प्रेम मिलता है। उनसे वियोग नहीं होता है ।
    *करण के पठन श्रवण से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है ।
    इसलिए हर मनुष्य को जीवन में शुभ फलो की प्राप्ति के लिए नित्य पंचांग को देखना, पढ़ना चाहिए ।

    आज का पंचांग, Aaj ka Panchangमंगलवार का पंचांग, Mangalvar Ka Panchang,

    17 मार्च Ka Panchang 17 March का पंचांग, 2026 ka panchang,

    हनुमान जी का मंत्र : हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट् ।

    दोस्तों, हमारा whats up नंबर whats up ने रिस्ट्रीक्ड कर रखा है जिससे हम ब्राडकॉस्ट पर लोगो को मैसेज नहीं भेज पा रहे है। सिंगल सिंगल मैसेज भेजने से एकाउंट ब्लॉक हो जा रहा है ।

    अब अगर आप 16 सालो से निरंतर बनते, भेजते पंचांग को पढ़ना चाहते है और आप चाहते है कि आपके और दुसरो के पास भी नित्य पंचांग पहुँचता जाय तो कृपया हमारे नंबर 94252 03501 को अपने किसी ना किसी ग्रुप से अवश्य ही जोड़ ले ।

    यदि आपके पास कभी भी हमारा पंचांग पहुंचा है तो सप्ताह के जिस दिन का भी आपके पास लिंक है उस पर क्लिक करके आप उस दिन का पंचांग पढ़ सकते है और हर पंचांग पर उसके अगले और पीछे के दिन का लिंक लगा होता है,
    अर्थात यदि आपके पास हमारे किसी भी दिन के पंचांग का लिंक है तो आप सप्ताह के किसी भी दिन का पंचांग अवश्य पढ़ सकते है ।

    हम अपने व्हाट्स अप नंबर के स्टेटस पर नित्य सुबह पंचांग को लगा देते है आप वहां से भी पढ़ सकते है और पंचांग को अपना व्हाट्स अप स्टेटस पर लगा सकते है जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग पंचांग का लाभ उठा सकें।

    कृपया इसे अपना फर्ज / धर्म समझकर, आप इस मैसेज को देखने के बाद इस पोस्ट / पेज का लिंक आगे ज्यादा से ज्यादा लोगो को शेयर करके सहयोग करें , जिससे लोग इस पंचांग के प्रसार – प्रसार में अपना भी बहुमूल्य योगदान दे सकें । ईश्वर अच्छे लोगो का सदैव ही साथ देता है उन पर अपनी कृपा बरसता है ।

    आप सभी पर ईश्वर की सदैव असीम कृपा रहे । धन्यवाद
    💰🔝💰🔝💰🔝💰🔝💰🔝💰🔝💰🔝💰


    ।। आज का दिन मंगलमय हो ।।

    *विक्रम संवत् 2082,
    *शक संवत – 194
    7
    *कलि सम्वत 5127
    *अयन – 
    उत्तरायण
    *ऋतु – बसंत
     ऋतु
    *मास –
     चैत्र माह,
    *पक्ष – कृष्ण पक्ष
    *चंद्र बल – वृषभ, मिथुन, कन्या, वृश्चिक, मकर, कुम्भ,

    मंगलवार को मंगल की होरा :-

    प्रात: 6.29 AM से 7.29 AM तक

    दोपहर 01.30 PM से 2.30 PM तक

    रात्रि 20.12 PM से 21.15 PM तक

    मंगलवार को मंगल की होरा में हाथ की निम्न मंगल पर दो बूंद सरसो का तेल लगा कर उसे हल्के हल्के रगड़ते हुए अधिक से अधिक मंगल देव के मन्त्र का जाप करें ।

    कृषि, भूमि, भवन, इंजीनियरिंग, खेलो, साहस, आत्मविश्वास

    और भाई के लिए मंगल की होरा अति उत्तम मानी जाती है ।

    मंगलवार के दिन मंगल की होरा में मंगल देव के मंत्रो का जाप करने से कुंडली में मंगल मजबूत होते है, पूरे दिन शुभ फलो की प्राप्ति होती है ।

    मंगल देव के मन्त्र

    ॐ अं अंगारकाय नम: अथवा

    ॐ भौं भौमाय नम:”

    जरूर पढ़े :-  जीवन में समस्त संकटो को दूर करने, सफलता का द्वार खोलने के लिए नवरात्री के मंगलवार को अवश्य ही करें ये उपाय,

    तिथि :- त्रियोदशी 09.23 AM तक तत्पश्चात चतुर्दशी,

    तिथि के स्वामी :- त्रियोदशी तिथि के स्वामी कामदेव जी और चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान भोलेनाथ जी है ।

    त्रयोदशी तिथि के स्वामी कामदेव जी  हैं। कामदेव प्रेम के देवता माने जाते है । उन्हें सदैव युवा और आकर्षक रहने का वरदान है।

    पौराणिक कथाओं के अनुसार कामदेव, भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी के पुत्र माने गए  हैं। उनका विवाह प्रेम और आकर्षण की देवी रति से हुआ है।

    कामदेव के हाथ में धनुष है जिसका एक कोना स्थिरता और दूसरा कोना चंचलता का प्रतीक है। कामदेव का धनुष फूलों का बना हुआ है। कामदेव जब कमान से अपना तीर छोड़ते हैं, तो उसमें कोई आवाज नहीं होती है।

    कामदेव के बाण की यह विशेष बात है कि इनसे घायल होने के बाद भी व्यक्ति आनंद का सुखद अहसास महसूस करता है।

    कामदेव का सम्बन्ध शुभ, प्रेम, सुख, सौंदर्य, यौवन, आनंद और कामेच्छा से है ।

    कामदेव का वाहन हाथी को  माना गया है। शास्त्रों में कुछ जगह कामदेव का वाहन तोते को भी बताया गया है ।

    त्रियोदशी के दिन मीठे वचन बोलने, प्रसन्न रहने से जातक रूपवान होता है, उसे अपने प्रेम में सफलता एवं इच्छित एवं योग्य जीवनसाथी प्राप्त होता है।

    त्रियोदशी को कामदेव जी का स्मरण करने से वैवाहिक सुख भी पूर्णरूप से मिलता है।  +

    अपने रूप और आकर्षण शक्ति को बढ़ाने के लिए  त्रियोदशी को कामदेव जी का मन्त्र ‘ॐ कामदेवाय विद्महे, रति प्रियायै धीमहि, तन्नो अनंग प्रचोदयात्’ की एक माला  जाप अवश्य करें ।

    इस तिथि का खास नाम जयकारा भी है। समान्यता त्रयोदशी तिथि यात्रा एवं शुभ कार्यो के लिए श्रेष्ठ होती है।

    त्रियोदशी को बैगन नहीं खाना चाहिए , त्रियोदशी को बैगन खाने से पुत्र को कष्ट मिलता है।

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    आज चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की शिवरात्रि, इस हिन्दू वर्ष की अंतिम शिवरात्रि है । प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है । मासिक शिवरात्रि तिथि के स्वामी भगवान शिव हैं ।

    अतः प्रत्येक मास की मासिक चतुर्दशी के दिन शिव जी की पूजा, अर्चना एवं रुद्राभिषेक करने से भगवान शिव समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं, भक्तो के सभी संकट दूर होते है ।

    चतुर्दशी तिथि / मासिक शिवरात्रि में रात्रि में शिव मंत्र या जागरण करना बहुत उत्तम रहता है ।

    किसी भी पक्ष की चतुर्दशी में शुभ कार्य करना वर्जित हैं क्योंकि इसे क्रूरा कहा जाता है, चतुर्दशी तिथि रिक्ता तिथियों की श्रेणी में आती है।

    चतुर्दशी तिथि में जन्मा जातक समान्यता धर्मात्मा, धनवान, यशस्वी, साहसी, परिश्रमी तथा बड़ो का आदर सत्कार करने वाला होता है।

    चतुर्दशी तिथि में जन्मे लोगों को क्रोध बहुत आता है। इस तिथि में जन्मे जातक साहसी और परिश्रमी होते हैं। इन लोगों को जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है तभी इन्हे सफलता हाथ लगती है।

    चतुर्दशी तिथि में जन्मे जातकों को नित्य भगवान शंकर की पूजा अवश्य करनी चाहिए।

    चतुर्दशी तिथि को समस्त संकटो से मुक्ति के लिए महामृत्युंजय मंत्र – ‘ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात्” का जाप करना अत्यंत फलदाई रहता है ।

    शास्त्रों में चतुर्दशी को हिंसा, अनैतिक कार्य, मांस-मदिरा का सेवन, तिल का तेल, लाल रंग का साग, काँसे के बर्तन में भोजन एवं शारीरिक संबंध बनाना मना किया गया है ।

    शास्त्रों में 3 चतुर्दशी तिथियों का बहुत महत्त्व बताया गया है । ये है अनंत चतुर्दशी, नरक चतुर्दशी और बैकुंठ चतुर्दशी ।

    • नक्षत्र (Nakshatra) – शतभिषा 06.09 AM बुधवार 18 मार्च तक
    • नक्षत्र के देवता, ग्रह स्वामी –  शतभिषा नक्षत्र के देवता वरुण देव जी और शतभिषा के स्वामी राहु जी है ।

    शतभिषा नक्षत्र का स्थान आकाश मंडल के नक्षत्रो में 24 वां है।। ‘शतभिषा’ का अर्थ है ‘सौ चिकित्सक’ अथवा ‘सौ चिकित्सा’। यह एक चक्र, एक बैल गाड़ी जो चिकित्सा का प्रतीक है जैसा प्रतीत होता है। ऐसे जातक पर राहु और शनि का प्रभाव रहता है।

     शताभिषा नक्षत्र सितारे का लिंग तटस्थ है। शताभिषा नक्षत्र का आराध्य वृक्ष: कदंब, तथा स्वाभाव चर होता है ।

    यदि कुंडली में राहु और शनि का प्रभाव अच्छा है तो जातक दार्शनिक, वैज्ञानिक, अच्छे आचरण वाला, आत्मविश्वास से भरा हुआ, महत्वाकांक्षी, साहसी, सदाचारी, दाता, धार्मिक लेकिन कठोर स्वाभाव वाला होता है।

    लेकिन राहु के खराब होने पर जातक तंत्र मन्त्र पर बहुत विश्वास रखने वाला, वहमी, शक्की, पराई स्त्री पर आसक्त रहने वाला, कलह प्रिय, घर से दूर रहने की चाह रखने वाला, घर वालो को दुःख देने वाला होता है । 


    अत: शतभिषा नक्षत्र के जातको को राहु को अपने अनुकूल करने का उपाय अवश्य जी करना चाहिए ।

    शतभिषा नक्षत्र के लिए भाग्यशाली संख्या 4 और 8, भाग्यशाली रंग हरा और नीला, भाग्यशाली दिन शुक्रवार, शनिवार और सोमवार होता है ।

    शतभिषा नक्षत्र में जन्मे जातको को नित्य तथा अन्य सभी को आज  नक्षत्र देवता नाममंत्र:- “ॐ वरुणाय नमः “ या नक्षत्र नाम मंत्र :- “ॐ शतभिषजे नमः” मन्त्र की एक माला का जाप अवश्य करना चाहिए।

    शतभिषा नक्षत्र के जातको को  भगवान शंकर जी की उपासना करने से आशातीत सफलता मिलती है ।

    • योग :- सिद्ध 08.15 AM तक तत्पश्चात साध्य
    • योग के स्वामी :-   सिद्ध योग के स्वामी भगवान कार्तिकेय जी और स्वभाव श्रेष्ठ माना जाता है ।
    • प्रथम करण : – वणिज 09.23 AM तक
    • करण के स्वामी, स्वभाव :-   वणिज करण की स्वामी लक्ष्मी देवी और स्वभाव सौम्य है ।
    • द्वितीय करण : – विष्टि 20.59 PM तक तत्पश्चात शकुनि
    • करण के स्वामी, स्वभाव :-      विष्टि करण के स्वामी यम और स्वभाव क्रूर है ।
    • ब्रह्म मुहूर्त : 04.53 AM से 5.41 AM तक
    • विजय मुहूर्त : 14.30 PM से 15.18 PM तक
    • गोधूलि मुहूर्त : 18.28 PM से 18.52 PM तक
    • अमृत काल : 23.01 PM से 12.36 AM तक
    • दिशाशूल (Dishashool)- मंगलवार को उत्तर दिशा का दिकशूल होता है।

      यात्रा, कार्यों में सफलता के लिए घर से गुड़ खाकर जाएँ ।
    • गुलिक काल : – दोपहर 12:00 से 01:30 तक है ।
    • राहुकाल (Rahukaal) दिन – 3:00 से 4:30 तक।
    • सूर्योदय – प्रातः 06:29
    • सूर्यास्त – सायं 18:30
    • विशेष – त्रियोदशी को बैगन नहीं खाना चाहिए , त्रियोदशी को बैगन खाने से पुत्र को कष्ट मिलता है । 

      चतुर्दशी तिथि , श्राद्ध और व्रत के दिन काँसे के बर्तन में भोजन करना, तिल का तेल का सेवन करना, सहवास करना, क्रोध करना, हिंसा करना निषिद्ध कहा गया है ।
    • पर्व – त्यौहार- मासिक शिवरात्रि

    “हे आज की तिथि (तिथि के स्वामी), आज के वार, आज के नक्षत्र (नक्षत्र के देवता और नक्षत्र के ग्रह स्वामी ), आज के योग और आज के करण, आप इस पंचांग को सुनने और पढ़ने वाले जातक पर अपनी कृपा बनाए रखे, इनको जीवन के समस्त क्षेत्रो में सदैव हीं श्रेष्ठ सफलता प्राप्त हो “।

    आप का आज का दिन अत्यंत मंगल दायक हो ।

    17 मार्च 2026 का पंचांग, 17 March 2026 ka panchang, mangalwar ka panchang, aaj ka panchang, aaj ka rahu kaal, aaj ka shubh panchang,mangalwar ka rahu kaal, mangalwar ka shubh panchang, panchang, tuesday ka panchang, tuesday ka rahu kaal, आज का पंचांग, मंगलवार का पंचांग, आज का राहुकाल, आज का शुभ पंचांग, ट्यूसडे का पंचांग, ट्यूसडे का राहुकाल, पंचांग, मंगलवार का राहु काल, मंगलवार का शुभ पंचांग,

    ज्योतिषाचार्य मुक्ति नारायण पाण्डेय
    ( हस्त रेखा, कुंडली, ज्योतिष विशेषज्ञ )
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    सोमवार का पंचांग, Somwar Ka Panchang, 16 मार्च 2026 का पंचांग,


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    Panchang, पंचाग, आज का पंचांग, aaj ka panchang, ( Panchang 2026, हिन्दू पंचाग, Hindu Panchang ) पाँच अंगो के मिलने से बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं :-


    1:- तिथि (Tithi)
    2:- वार (Day)
    3:- नक्षत्र (Nakshatra)
    4:- योग (Yog)
    5:- करण (Karan)

    पंचाग (panchang) का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है इसीलिए भगवान श्रीराम भी पंचाग (panchang) का श्रवण करते थे ।
    जानिए, सोमवार का पंचांग, Somvar Ka Panchang।

    सोमवार का पंचांग, Somvar Ka Panchang,

    16 मार्च 2026 का पंचांग, 16 March 2026 ka Panchang,

    महा मृत्युंजय मंत्र – ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।

    • दिन (वार) – सोमवार के दिन क्षौरकर्म अर्थात बाल, दाढ़ी काटने या कटाने से पुत्र का अनिष्ट होता है शिवभक्ति को भी हानि पहुँचती है अत: सोमवार को ना तो बाल और ना ही दाढ़ी कटवाएं ।

      सोमवार के दिन भगवान शंकर की आराधना, अभिषेक करने से चन्द्रमा मजबूत होता है, काल सर्प दोष दूर होता है।

    सोमवार का व्रत रखने से मनचाहा जीवन साथी मिलता है, वैवाहिक जीवन में लम्बा और सुखमय होता है।

    जीवन में शुभ फलो की प्राप्ति के लिए हर सोमवार को शिवलिंग पर पंचामृत या मीठा कच्चा दूध एवं काले तिल चढ़ाएं, इससे भगवान महादेव की कृपा बनी रहती है परिवार से रोग दूर रहते है।

    सोमवार के दिन शिव पुराण के अचूक मन्त्र “श्री शिवाये नमस्तुभ्यम’ का अधिक से अधिक जाप करने से समस्त कष्ट दूर होते है. निश्चित ही मनवाँछित लाभ मिलता है।

    घर पर कैसा भी हो वास्तु दोष अवश्य करें ये उपाय, जानिए वास्तु दोष निवारण के अचूक उपाय

    *विक्रम संवत् – 2082,
    * शक संवत – 1947,
    *कलि संवत – 5127
    *कलयुग – 5127 वर्ष
    * अयन – उत्तरायण,
    * ऋतु – बसंत ऋतु,
    * मास – चैत्र माह,
    * पक्ष – कृष्ण पक्ष
    *चंद्र बल – मेष, वृषभ, सिंह, कन्या, धनु, कुम्भ,

    सोमवार को चन्द्रमा की होरा :-

    प्रात: 6.30 AM से 7.30 AM तक

    दोपहर 01.30 PM से 2.30 PM तक

    रात्रि 8.30 PM से 9.30 PM तक

    सोमवार को चन्द्रमा की होरा में अधिक से अधिक चन्द्र देव के मन्त्र का जाप करें। यात्रा, प्रेम, प्रसन्नता, कला सम्बन्धी कार्यो के लिए चन्द्रमा की होरा अति उत्तम मानी जाती है।

    सोमवार के दिन चन्द्रमा की होरा में चंद्रदेव के मंत्रो का जाप करने से कुंडली में चंद्र देव मजबूत होते है, पूरे दिन शुभ फलो की प्राप्ति होती है ।

    चन्द्रमा के मन्त्र

    ॐ सों सोमाय नम:।

    ॐ श्रीं श्रीं चन्द्रमसे नम: ।

    • तिथि (Tithi) – द्वादशी 09.40 AM तक तत्पश्चात त्रियोदशी,
    • तिथि का स्वामी – द्वादशी तिथि के स्वामी भगवान श्री विष्णु जी और त्रियोदशी तिथि के स्वामी कामदेव जी है ।
       
    • हिंदू पंचाग की बाहरवीं तिथि द्वादशी (Dwadashi) कहलाती है। द्वादशी तिथि के स्वामी भगवान श्री हरि, श्री विष्णु जी है ।
    • इस तिथि का नाम यशोबला भी है, क्योंकि इस दिन भगवान श्री विष्णु जी / भगवान श्रीकृष्ण जी का आंवले, इलाइची, पीले फूलो से पूजन करने से यश,  बल और साहस की प्राप्ति होती है।  
    • द्वादशी को श्री विष्णु जी की पूजा , अर्चना करने से मनुष्य को समस्त भौतिक सुखो और ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है, उसे समाज में सर्वत्र आदर मिलता है, उसकी समस्त मनोकामनाएं निश्चय ही पूर्ण होती है।
    • द्वादशी तिथि के दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यन्त श्रेयकर होता है।  द्वादशी के दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मन्त्र की एक माला का जाप अवश्य करें ।
    • भगवान विष्णु के भक्त बुध ग्रह का जन्म भी द्वादशी तिथि के दिन माना जाता है। इस दिन विष्णु भगवान के पूजन से बुध ग्रह भी मजबूत होता है ।
    • यदि द्वादशी तिथि सोमवार और शुक्रवार को पड़ती है तो मृत्युदा योग बनाती है। इस योग में शुभ कार्य करना वर्जित है। द्वादशी यदि रविवार के दिन पड़ती है तो क्रकच योग बनाती है, यह अशुभ माना जाता है, इसमें भी शुभ कार्य करना मना किया गया हैं।
    • लेकिन द्वादशी तिथि जब बुधवार को होती है तो सिद्धा कहलाती है,  ऐसे समय में किये गए कार्य कार्य सिद्ध होते है।
    • द्वादशी तिथि में विष्टि करण होने के कारण इस तिथि को भद्रा तिथि भी कहते है।
    • द्वादशी तिथि के दिन विवाह, तथा अन्य शुभ कार्य किये जाते है लेकिन इस तिथि में नए घर का निर्माण, ग्रह प्रवेश करना मना किया जाता है ।
    • द्वादशी के दिन तुलसी तोड़ना निषिद्ध है।  द्वादशी के दिन यात्रा नहीं करनी चाहिए, इस दिन यात्रा करने से धन हानि एवं असफलता की सम्भावना रहती है।  द्वादशी के दिन मसूर का सेवन वर्जित है। 
    • द्वादशी की दिशा नैऋत्य मानी गई है इस दिन इस दिशा की ओर किए गए कार्य शुभ फल देने वाले माने जाते हैं।

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    आज चैत्र माह के कृष्ण पक्ष का प्रदोष ब्रत, हिन्दू वर्ष का अंतिम प्रदोष ब्रत है,सोमवार को होने के कारण इसे सोम प्रदोष ब्रत कहा जायेगा ।

    प्रदोष तिथि को भगवान भोलेनाथ जी का ब्रत रखा जाता है। मान्यता है कि जो जातक प्रदोष का व्रत रख कर संध्या के समय शंकर जी की आराधना करते हैं उन्हें योग्य जीवन साथी मिलता है, दाम्पत्य जीवन में प्रेम और सहयोग बना रहता है ।

    मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव के साथ-साथ माता पार्वती का पूजन करने से जीवन में सुख – सौभाग्य की वर्षा होती है, साथ ही जातक के सभी संकट दूर हो जाते हैं । ।

    प्रदोष व्रत में सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक पूजा करने का विशेष महत्त्व है । इस दिन सम्पूर्ण शिव परिवार का पूजन करने से भगवान शिव अपने भक्त पर बहुत प्रसन्न होते है ।

    इस दिन अति शुभ प्रदोष काल शाम 6:11 से रात 8:34 तक रहेगा, जिसमें भगवान शंकर जी और माता पार्वती जी की पूजा करना अत्यंत शुभ फलदाई होगा ।

    प्रदोष व्रत को महिलाएं अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए रखती हैं।प्रदोष ब्रत रखने वाले जातक के पूरे परिवार पर भगवान भोलनाथ और माँ पार्वती की सदैव असीम कृपा बनी रहती है ।

    प्रदोष ब्रत के दिन शिव पंचाक्षर मन्त्र ॐ नम: शिवाय तथा

    महामृत्युंजय मन्त्र :- ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
    का जाप करने से सहस्त्र गुना पुण्य की प्राप्ति होती है ।

    प्रदोष को प्रदोष कहने के शास्त्रों में एक मिलती है। माना जाता है कि एक बार चंद्र देव को क्षय रोग हो गया, जिसके कारण उन्हें बहुत कष्ट हो रहा था।

    अपने रोग के निवारण के लिए चंद्र देव जी भगवान शिव के पास गए, प्रभु ने चंद्र देव के क्षय रोग का निवारण त्रयो करके उन्हें त्रियोदशी के दिन ही पुन:जीवन प्रदान किया था तभी से इस दिन को प्रदोष कहा जाने लगा है ।

    प्रदोष व्रत में फलाहार किया जाता है इस व्रत में अन्न, चावल, लाल मिर्च, सादा नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

    नक्षत्र (Nakshatra) – धनिष्ठा 06.22 AM मंगलवार 17 मार्च तक

    नक्षत्र के देवता, ग्रह स्वामी-      धनिष्ठा नक्षत्र का स्वामी मंगल और देवता वसु हैं ।  

    27 नक्षत्रों में से धनिष्ठा नक्षत्र 23वां नक्षत्र है। ‘धनिष्ठा’ का अर्थ होता है ‘सबसे अधिक धनवान’। 

     वैदिक ज्योतिष में आठ वसुओं को इस नक्षत्र का अधिपति देवता माना गया है, वसु श्रेष्ठता, सुरक्षा, धन-धान्य आदि वस्तुओं के ही दूसरे नाम भी हैं।

    धनिष्ठा नक्षत्र एक ड्रम के आकार का नक्षत्र माना जाता है, जिसे ‘सबसे अधिक सुना जाने वाला’ नक्षत्र कहते है।

    धनिष्ठा नक्षत्र का गण – राक्षस तथा सितारा का लिंग महिला है। धनिष्ठा नक्षत्र का आराध्य वृक्ष: शमी, तथा स्वाभाव शुभ होता है ।

    इस नक्षत्र में जन्में व्यक्ति अनेको गुणों से समृद्ध होकर जीवन में सुख-समृद्धि, उच्च पद, प्रतिष्ठा प्राप्त करते है। ये लोग स्वभाव से संवेदनशील, दानी एवं अध्यात्मिक होते हैं। इस नक्षत्र के जातक दूसरों को कड़वे वचन नहीं बोलते है। यह अपने सम्बन्धो, कार्यो के प्रति ईमानदार होते हैं।  

    धनिष्ठा नक्षत्र के लिए भाग्यशाली संख्या 8 और 9, भाग्यशाली रंग चमकीला स्लेटी, ग्रे, भाग्यशाली दिन शुक्रवार और बुधवार होता है ।

    धनिष्ठा नक्षत्र में जन्मे जातको को नित्य तथा अन्य सभी को आज  “ॐ धनिष्ठायै नमः “ मन्त्र की एक माला का जाप अवश्य करना चाहिए।

    धनिष्ठा नक्षत्र के जातको को दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से सुख – समृद्धि एवं समस्त सुखो की प्राप्ति होती है। इस नक्षत्र के जातको के लिए भगवान शिव की पूजा भी शुभफलदायक मानी जाती है।

    इस नक्षत्र के जातको को विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से भी समस्त सांसारिक सुख मिलते है। 

      अगर पश्चिम मुख का है आपका घर तो ऐसा रहना चाहिए आपके घर का वास्तु, जानिए पश्चिम दिशा के अचूक वास्तु टिप्स 


    • योग – शिव 09.37 AM तक तत्पश्चात सिद्ध

    • योग के स्वामी :-  शिव योग के स्वामी मित्र देव एवं स्वभाव श्रेष्ठ माना जाता है ।
    • प्रथम करण : – तैतिल 09.40 AM तक
    • करण के स्वामी, स्वभाव :-      तैतिल करण के स्वामी विश्वकर्मा जी और स्वभाव सौम्य है ।

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    • द्वितीय करण : – गर 21 .37 PM तक तत्पश्चात वणिज
    • करण के स्वामी, स्वभाव :-  गर करण के स्वामी भूमि तथा स्वभाव सौम्य है ।
    • ब्रह्म मुहूर्त : 4.54 AM से 5.42 AM तक
    • विजय मुहूर्त : 14.30 PM से 15.18 PM तक
    • गोधूलि मुहूर्त : 18.27 PM से 16.52 PM तक
    • अमृत काल : 19.47 PM से 21.24 PM तक
    • विशेष – द्वादशी के दिन तुलसी तोड़ना,  मसूर का सेवन करना  वर्जित है।
    • द्वादशी के दिन यात्रा नहीं करनी चाहिए, इस दिन यात्रा करने से धन हानि एवं असफलता की सम्भावना रहती है।  
    • त्रियोदशी को बैगन नहीं खाना चाहिए , त्रियोदशी को बैगन खाने से पुत्र को कष्ट मिलता है ।
    • पर्व त्यौहार-
    • मुहूर्त (Muhurt) –

    “हे आज की तिथि ( तिथि के स्वामी ), आज के वार, आज के नक्षत्र ( नक्षत्र के देवता और नक्षत्र के ग्रह स्वामी ), आज के योग और आज के करण, आप इस पंचांग को सुनने और पढ़ने वाले जातक पर अपनी कृपा बनाए रखे, इनको जीवन के समस्त क्षेत्रो में सदैव हीं श्रेष्ठ सफलता प्राप्त हो “।

    आप का आज का दिन अत्यंत मंगल दायक हो ।

    अपने धर्म, अपनी संस्कृति अपने नैतिक मूल्यों के प्रचार, प्रसार के लिए तन – मन – धन से अपना बहुमूल्य सहयोग करें । आप हमें अपनी इच्छा – सामर्थ्य के अनुसार सहयोग राशि 9425203501 पर Google Pay कर सकते है ।
    आप पर ईश्वर की असीम अनुकम्पा की वर्षा होती रहे ।

    16 मार्च 2026 का पंचांग, 16 March 2026 ka Panchang, aaj ka panchang, aaj ka rahu kaal, aaj ka shubh panchang, monday ka panchang, monday ka rahu kaal, panchang, somvar ka panchang, somvar ka rahu kaal, somvar ka shubh panchang,

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    ज्योतिषाचार्य मुक्ति नारायण पाण्डेय
    ( हस्त रेखा, कुंडली, ज्योतिष विशेषज्ञ )
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    रविवार का पंचांग, Raviwar Ka Panchag, 15 मार्च का पंचांग 2026 का पंचांग,

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    15 मार्च 2026 का पंचांग, 15 March 2026 ka Panchang,

    अवश्य पढ़ें :-  मनचाही नौकरी चाहते हो, नौकरी मिलने में आती हो परेशानियाँ  तो अवश्य करें ये उपाय 

    Panchang, पंचाग, आज का पंचांग, aaj ka panchang, Panchang 2026, हिन्दू पंचाग, Hindu Panchang पाँच अंगो के मिलने से बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं :-


    1:- तिथि (Tithi)
    2:- वार (Day)
    3:- नक्षत्र (Nakshatra)
    4:- योग (Yog)
    5:- करण (Karan)



    पंचाग (panchang) का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है इसीलिए भगवान श्रीराम भी पंचाग (panchang) का श्रवण करते थे । जानिए रविवार का पंचांग, Ravivar Ka Panchang।

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    जानिए नवरात्री में कन्या पूजन में माता के किन किन स्वरूपों की पूजा की जाती है

    भगवान सूर्य जी का मंत्र : ऊँ घृणि सूर्याय नम: ।।
    ।। आज का दिन अत्यंत मंगलमय हो ।।

    👉🏽दिन (वार) रविवार को की गई सूर्य पूजा से व्यक्ति को घर-परिवार और समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। रविवार के दिन उगते हुए सूर्य को देव को एक ताबें के लोटे में जल, चावल, लाल फूल और रोली डालकर अर्ध्य करें।

    इस दिन आदित्य ह्रदय स्रोत्र का पाठ करें एवं यथा संभव मीठा भोजन करें। सूर्य को आत्मा का कारक माना गया है, सूर्य देव को जल देने से पितृ कृपा भी मिलती है।

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    रविवार के दिन भैरव जी के दर्शन, आराधना से समस्त भय और संकट दूर होते है, साहस एवं बल की प्राप्ति होती है । अत: रविवार के दिन मंदिर में भैरव जी के दर्शन अवश्य करें ।

    रविवार के दिन भैरव जी के मन्त्र ” ॐ काल भैरवाय नमः “ या ” ॐ श्री भैरवाय नमः “ की एक माला जाप करने से समस्त संकट, भय दूर होते है, रोगो, अकाल मृत्यु से बचाव होता है, मनवांछित लाभ मिलता है।


    * विक्रम संवत् – 2082, वर्ष
    * शक संवत – 1947, वर्ष
    * कलि संवत 5127, वर्ष
    * कलयुग – 5127, वर्ष
    * अयन – उत्तरायण,
    * ऋतु – बसंत ऋतु,
    * मास – चैत्र माह
    * पक्ष – कृष्ण पक्ष
    * चंद्र बल – मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, मकर, मीन,

    रविवार को सूर्य देव की होरा :-

    प्रात: 6.31 AM से 7.31 AM तक

    दोपहर 01.30 PM से 02.30 PM तक

    रात्रि 20.29 PM से 9.29 PM तक

    रविवार को सूर्य की होरा में अधिक से अधिक अनामिका उंगली / रिंग फिंगर पर थोड़ा सा घी लगाकर मसाज करते हुए सूर्य देव के मंत्रो का जाप करें ।

    सुख समृद्धि, मान सम्मान, सरकारी कार्यो, नौकरी, साहसिक कार्यो, राजनीती, कोर्ट – कचहरी आदि कार्यो में सफलता के लिए रविवार की होरा अति उत्तम मानी जाती है ।

    रविवार के दिन सूर्य देव की होरा में सूर्य देव के मंत्रो का जाप करने से कुंडली में सूर्य ग्रह मजबूत होते है, पूरे दिन शुभ फलो की प्राप्ति होती है ।

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    सूर्य देव के मन्त्र :-

    ॐ भास्कराय नमः।।

    अथवा

    ऊँ घृणि सूर्याय नम: ।।

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    आज अति शुभ पापमोचिनी एकादशी है, पापमोचिनी एकादशी हिन्दू पंचाग, हिन्दू वर्ष की अंतिम एकादशी कहलाती है ।

    इस संसार में प्रत्येक मनुष्य से जाने अनजाने में पाप होते है, इन पापो के दंड से बचने के लिए, पापो के प्रायश्चित के लिए, नरक की यातना बचने के लिए पाप मोचिनी एकादशी का ब्रत अवश्य जी करना चाहिए ।

    इस एकादशी के ब्रत के बारे में स्वंय भगवान श्री कृष्ण जी ने कहा है की इस एकादशी का ब्रत निश्चय जी समस्त पापो का नाश करने वाला है ।

    पापमोचिनी एकादशी व्रत के पुण्य प्रभाव से जातक जन्म जन्मान्तर के जाने अनजाने में किये पापो से मुक्त हो जाता है।

    भविष्योत्तर पुराण के अनुसार इस व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है । शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को रखने से मनुष्य को समस्त सांसारिक सुखों को भोगने के साथ अंत में बैकुंठ धाम मिलता है ।

    एकादशी के दिन भगवान श्री नारायण जी की पीले पुष्प, आँवला, नारियल और तुलसी जी अर्पित करके पूजा करनी चाहिए लेकिन तुलसी जी को पहले ही तोड़ लेना चाहिए ।

    एकादशी के दिन भगवान विष्णु जी के मन्त्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” अथवा ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।। का आशिक से अधिक जाप करना चाहिए ।

    एकादशी के दिन जल में आँवले का चूर्ण या आँवले का रस डाल कर स्नान करने से समस्त पापो का नाश होता है।

    एकादशी के दिन रात्रि में भगवान विष्णु के सामने ऐसा दीपक जलाएं जो रात भर जलता रहे।

    एकादशी के दिन चावल और दूसरे का अन्न खाना मना है । एकादशी के दिन चावल खाने से रोग और पाप बढ़ते है, एकादशी के दिन दूसरे का अन्न खाने से समस्त पुण्यों का नाश हो जाता है ।

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    नक्षत्र :- श्रवण 05.56 AM सोमवार 16 मार्च तक

    नक्षत्र के स्वामी :-        श्रवण नक्षत्र के देवता विष्णु और सरस्वती जी तथा स्वामी चंद्र देव जी है ।  

    श्रवण नक्षत्र 22 वें नंबर का नक्षत्र  है। यह एक त्रिशूल के जैसा प्रतीत होता है। श्रवण नक्षत्र का आराध्य वृक्ष आक या  मंदार, और नक्षत्र का स्वभाव चर माना गया है । श्रावण नक्षत्र का लिंग पुरुष है।

    श्रवण नक्षत्र के जातक पर शनि और चंद्र का प्रभाव जीवनभर बना रहता है।  श्रवण नक्षत्र के जातक बुद्धिमान और अपने कार्यो में निपुण होते हैं । 

    श्रवण नक्षत्र में जन्म होने से जातक सुंदर, दानवान, आज्ञाकारी, सर्वगुण संपन्न, धनवान और अपने क्षेत्र में मान सम्मान प्राप्त करता है।

    लेकिन यदि शनि और चंद्र की स्थिति ठीक नहीं है तो ऐसा जातक क्रोधी, कंजूस, भय-शंकित रहने वाला, लापरवाह, आलसी होता है। 

    यदि शनि और चंद्र कुंडली में एक ही जगह है, तो जातक को जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है।

     इसलिए जातक को हनुमानजी की सदैव उपासना करना है। जातक को शराब, मांस आदि व्यसनों से दूर रहना चाहिए।

    श्रवण नक्षत्र के लिए भाग्यशाली संख्या 2 और 8, भाग्यशाली रंग, आसमानी, हल्का नीला, भाग्यशाली दिन गुरुवार, बुधवार और सोमवार माना जाता है ।

    श्रवण नक्षत्र में जन्मे जातको को तथा जिस दिन यह नक्षत्र हो उस दिन सभी को “ॐ श्रवणाय नमः “। मन्त्र का जाप अवश्य करना चाहिए ।


    घर के बैडरूम में अगर है यह दोष तो दाम्पत्य जीवन में आएगी परेशानियाँ, जानिए बैडरूम के वास्तु टिप्स

    • योग (Yog) – परिध 10.25 AM तक तत्पश्चात शिव
    • योग के स्वामी :-     परिध योग की स्वामी विश्वकर्मा जी एवं स्वभाव हानिकारक माना जाता है । 
    • प्रथम करण : – बालव 09.16 AM तक
    • करण के स्वामी, स्वभाव :-   बालव करण के स्वामी ब्रह्म जी और स्वभाव सौम्य है ।
    • द्वितीय करण : – कौलव 21.33 PM तक तत्पश्चात तैतिल
    • करण के स्वामी, स्वभाव :-    कौलव करण के स्वामी मित्र और स्वभाव सौम्य है ।
    • ब्रह्म मुहूर्त : 4.55 AM से 5.43 AM तक
    • विजय मुहूर्त : 14.30 PM से 15.18 PM तक
    • गोधूलि मुहूर्त : 18.27 PM से 18.51 PM तक
    • अमृत काल :- अमृत काल 19.03 PM से 20.43 PM तक
    • दिशाशूल (Dishashool)- रविवार को पश्चिम दिशा का दिकशूल होता है । यात्रा, कार्यों में सफलता के लिए घर से पान या घी खाकर जाएँ ।
    • गुलिक काल : – अपराह्न – 3:00 से 4:30 तक ।
    • राहुकाल (Rahukaal)-सायं – 4:30 से 6:00 तक ।
    • सूर्योदय – प्रातः 06:31
    • सूर्यास्त – सायं 18:29

      आँखों की रौशनी बढ़ाने, आँखों से चश्मा उतारने के लिए अवश्य करें ये उपाय

    • विशेष – रविवार को बिल्ब के वृक्ष / पौधे की पूजा अवश्य करनी चाहिए इससे समस्त पापो का नाश होता है, पुण्य बढ़ते है।

      रविवार के दिन भगवान सूर्य देव को आक का फूल अर्पण करना किसी भी यज्ञ के फल से कम नहीं है, इससे सूर्य देव की सदैव कृपा बनी रहती है ।

      रविवार को तुलसी जी को जल देना, तुलसी जी को तोड़ना वर्जित है ऐसा करने से पुण्य नष्ट होते है 1
    • एकादशी के दिन सेम फली, चावल का सेवन और दूसरो के अन्न का सेवन नहीं करना चाहिए ।
    •  एकादशी के दिन चावल खाने से रोग बढ़ते है और दूसरे का अन्न खाने से पुण्य नष्ट होते है ।
    • द्वादशी के दिन तुलसी तोड़ना,  मसूर का सेवन करना  वर्जित है।
    • द्वादशी के दिन यात्रा नहीं करनी चाहिए, इस दिन यात्रा करने से धन हानि एवं असफलता की सम्भावना रहती है।  

    “हे आज की तिथि (तिथि के स्वामी), आज के वार, आज के नक्षत्र ( नक्षत्र के देवता और नक्षत्र के ग्रह स्वामी ), आज के योग और आज के करण, आप इस पंचांग को सुनने और पढ़ने वाले जातक पर अपनी कृपा बनाए रखे, इनको जीवन के समस्त क्षेत्रो में सदैव हीं श्रेष्ठ सफलता प्राप्त हो “।

    आप का आज का दिन अत्यंत शुभ फलो वाला हो ।

    मित्रो हम इस साईट के माध्यम से वर्ष 2010 से निरंतर आप लोगो के साथ जुड़े है। आप भारत या विश्व के किसी भी स्थान पर रहते है, अपने धर्म अपनी संस्कृति को प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए आचार्य मुक्ति नारायण पांडेय अध्यात्म ज्योतिष परामर्श केंद्र रायपुर छत्तीसगढ़  www.memorymuseum.net के साथ अवश्य जुड़ें, हमारा सहयोग करें ।

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    आप पर ईश्वर का सदैव आशीर्वाद बना रहे ।
    आप का आज का दिन अत्यंत मंगल दायक हो ।

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    ज्योतिषाचार्य मुक्ति नारायण पाण्डेय
    ( हस्त रेखा, कुंडली, ज्योतिष विशेषज्ञ )
     संपर्क सूत्र: हर समस्या का समाधान आपका कुंडली में हीं है 9425203501 + 7587346995

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    Aacharya Mukti Narayan Pandey Adhyatma Jyotish paramarsh Kendra Raipur

    शनिवार का पंचांग, Shaniwar Ka Panchang, 21 मार्च 2026 का पंचांग ,

    शनिवार का पंचांग, Shaniwar Ka Panchang, 21 मार्च 2026 का पंचांग , आप सभी को नवरात्री के तीसरे दिन की हार्दिक शुभकामनायें , जय माँ चंद्रघंटा ...