Shukrwar ka panchag, शुक्रवार का पंचांग, 11 सितम्बर 2026 का पंचांग,
गुरुवार का पंचांग शनिवार का पंचांग
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शुक्रवार का पंचांग, shukrwar ka panchang,
- Panchang, पंचाग, Panchang 2026 हिन्दू पंचाग, Hindu Panchang, पाँच अंगो के मिलने से बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं :-
1:- तिथि (Tithi)
2:- वार (Day)
3:- नक्षत्र (Nakshatra)
4:- योग (Yog)
5:- करण (Karan)
पंचाग (panchang) का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है, नित्य पंचांग पढ़ने से कुंडली के ग्रहो के शुभ फल मिलने लगते है, इसीलिए भगवान श्रीराम भी नित्य पंचाग (panchang) का श्रवण करते थे ।
जानिए, Shukravar Ka Panchang, शुक्रवार का पंचांग, आज का पंचांग, aaj ka panchang,
11 सितम्बर 2026 का पंचांग, 11 September 2026 ka Panchang,

- महालक्ष्मी मन्त्र : ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥
- ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥
मित्रो हम पिछले 16 सालो से निरंतर पंचांग बनाते और इसका प्रचार प्रसार करते आ रहे है, अगर आप भी पंचांग को नित्य पढ़ना चाहते है और आप चाहते है कि आपके और दुसरो के पास भी नित्य पंचांग पहुँचता जाय तो कृपया हमारे नंबर 9425203501 को अपने किसी ना किसी ग्रुप से अवश्य ही जोड़ ले ।
- कृपया इसे अपना फर्ज / धर्म समझकर, आप इस मैसेज को देखने के बाद इस पोस्ट / पेज का लिंक आगे ज्यादा से ज्यादा लोगो को शेयर करके सहयोग करें , जिससे लोग इस पंचांग के प्रसार – प्रसार में अपना भी बहुमूल्य योगदान दे सकें । ईश्वर अच्छे लोगो का सदैव ही साथ देता है उन पर अपनी कृपा बरसता है ।
आप सभी पर ईश्वर की सदैव असीम कृपा रहे । धन्यवाद
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आज का पंचांग, aaj ka panchang,
दिन (वार) – शुक्रवार के दिन दक्षिणावर्ती शंख से भगवान विष्णु पर जल चढ़ाकर उन्हें पीले चन्दन अथवा केसर का तिलक करें। इस उपाय में मां लक्ष्मी जल्दी प्रसन्न हो जाती हैं।
शुक्रवार के दिन नियम पूर्वक धन लाभ के लिए लक्ष्मी माँ को अत्यंत प्रिय
“श्री सूक्त”,“महालक्ष्मी अष्टकम” एवं समस्त संकटो को दूर करने के लिए “माँ दुर्गा के 32 चमत्कारी नामो का पाठ” अवश्य ही करें ।
शुक्रवार के दिन माँ लक्ष्मी को हलवे या खीर का भोग लगाना चाहिए ।
शुक्रवार के दिन शुक्र ग्रह की आराधना करने से जीवन में जीवन में समस्त सुख 🎁 , ऐश्वर्य 🎉 की प्राप्ति होती है, दाम्पत्य जीवन 💝 सुखमय होता है बड़ा भवन 🏬, विदेश यात्रा ✈️ के योग बनते है।
* विक्रम संवत् – 2083 वर्ष
* शक संवत – 1948 वर्ष
* कलि संवत – 5128 वर्ष
* कलयुग – 5128 वर्ष
* अयन – दक्षिणायन,
* ऋतु – वर्षा ऋतु,
* मास – भाद्रपद माह
* पक्ष – कृष्ण पक्ष
* चंद्र बल – मिथुन, सिंह, तुला, वृश्चिक, कुम्भ, मीन,
इस तरह से मनाएं जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्री कृष्ण की बरसेगी असीम कृपा
आप बहुत ही सौभाग्य शाली है यदि आपको यह पंचाग नित्य पढ़ने को मिलता है,आप अपने जानने वाले कितने लोगो को जानते है जो नित्य यह पंचांग पढ़ पाते है, आप ईश्वर के प्रिय है जो आपको यह अवसर मिल रहा है,
इसलिए नित्य स्नान आदि के पश्चात सबसे पहले यह पंचाग पढ़े, इस पंचांग को आगे शेयर भी करें और पुण्य कमाएं ।
पंचांग को पढ़ने से तीर्थ दर्शन के समान फल मिलता है, देवता प्रसन्न होते है ।
शुक्रवार को शुक्र देव की होरा :-
प्रात: 06.04 AM से 7.06 AM तक
दोपहर 01.20 PM से 2.22 PM तक
रात्रि 20.27 PM से 21.24 PM तक

दाहिने हाथ के अंगूठे से नीचे के हिस्से ( शुक्र का स्थान ) और अंगूठे पर थोड़ा सा इत्र लगाकर, ( इत्र ना मिले तो उसके बिना भी कर सकते है) बाएं हाथ के अंगूठे से उस हिस्से को शुक्र की होरा में “ॐ शुक्राये नम:” या
‘ॐ द्रांम द्रींम द्रौंम स: शुक्राय नम:।’ मंत्र का अधिक से अधिक जाप करते हुए अधिक से अधिक रगड़ते / मसाज करते रहे ( कम से कम 10 मिनट अवश्य )I
यह उपाय आप कोई भी काम करते हुए चुपचाप कर सकते है इसके लिए किसी भी विधि विधान की कोई आवश्यकता नहीं है I
सुख समृद्धि 💰, ऐश्वर्य 💎, बड़ा भवन 🏬, विदेश यात्रा ✈️, प्रेम, रोमांस 💞, सुखी दाम्पत्य जीवन 👩❤️👨 के लिए शुक्रवार की होरा अति उत्तम मानी जाती है ।
शुक्रवार के दिन शुक्र की होरा में शुक्रदेव देव के मंत्रो का जाप करने से कुंडली में शुक ग्रह मजबूत होते है, पूरे दिन शुभ फलो 🎉 की प्राप्ति होती है ।
शुक्र देव के मन्त्र :-
ॐ शुं शुक्राय नमः।। अथवा
” ॐ द्राम द्रीम द्रौम सः शुक्राय नमः “।।
🕉️ शुक्रवार को अवश्य लें 10 महाविद्याओं के नाम 🕉️
- तिथि, (Tithi): अष्टमी तिथि 12.13 AM शनिवार 5 सितम्बर तक, तिथि, (Tithi) :-,
- तिथि के स्वामी – अष्टमी तिथि के स्वामी भगवान भोलेनाथ जी है I
आज भाद्रपद माह की अमावस्या है । भाद्रपद मास की अमावस्या हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण अमावस्याओं में मानी जाती है। इसे भादों अमावस्या, पिठौरी अमावस्या या कुशोत्पाटिनी अमावस्या आदि नामों से भी जाना जाता है।
कुश (दर्भ) को वैदिक कर्मकांड में अत्यंत पवित्र माना गया है। यज्ञ, तर्पण, श्राद्ध और अनेक धार्मिक अनुष्ठानों में कुश का प्रयोग होता है। शास्त्रों में इस दिन विधिपूर्वक कुश प्राप्त करने का विशेष महत्व बताया गया है।
इसलिए यह अमावस्या आने वाले पितृपक्ष और धार्मिक कर्मों की तैयारी से भी जुड़ी हुई है क्योंकि इसके बाद अगली अमावस्या अश्विन माह की अमावस्या है जो पितृ पक्ष में आती है और जिसे सर्व पितृ अमावस्या भी कहते है।
इस वर्ष भाद्रपद कृष्ण अमावस्या की तिथि गुरुवार 10 सितंबर 2026 को प्रात: 10:33 बजे शुरू होकर शुक्रवार 11 सितंबर 2026 को सुबह लगभग 8:56 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के आधार पर भाद्रपद अमावस्या शुक्रवार को मानी जाएगी ।
हिंदू पंचांग में अमावस्या वह तिथि है जब चंद्रमा दिखाई नहीं देता। धार्मिक दृष्टि से इसे अंतर्मुखी साधना, पितरों के स्मरण और पुराने कर्मों के परिष्कार के लिए विशेष समय माना गया है।
धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु तथा विभिन्न पुराणिक परंपराओं में अमावस्या पर स्नान, तर्पण, श्राद्ध / पितृकर्म और दान का विशेष महत्व बताया गया है। भाद्रपद अमावस्या विशेष रूप से पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और धार्मिक संकल्प लेने के लिए शुभ मानी जाती है।
अमावस्या तिथि के स्वामी पितृ देव जी और पितरों का वास पीपल के पेड़ पर माना गया है। अमावस्या के दिन सुबह के समय लोहे के बर्तन में, दूध, पानी, काले तिल, शहद एवं जौ मिला कर समस्त सामग्री पीपल की जड़ में अर्पित करके पीपल की 7 परिक्रमा करें, तथा इस दौरान “ॐ सर्व पितृ देवताभ्यो नमः” मंत्र का जाप भी लगातार करते रहें । इस उपाय को करने से पितृ प्रसन्न होते है, उनका आशीर्वाद मिलता है ।
अमावस्या तिथि को पितरों के तर्पण, दान के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है । इस दिन लोग पवित्र नदियों में स्नान करके भगवान सूर्यदेव को अर्घ्य देकर अपने पितरों की शांति के लिए उनका तर्पण करते हैं ।
अमावास्यां पितॄणां तु
श्राद्धं कुर्याद् विचक्षणः।
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति अमावस्या के दिन पितरों के निमित्त श्राद्ध करे।
इस दिन प्रात: जल में काले तिल और थोड़ा कुश डालकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल अर्पित करें और मन में कहें:
“ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः।”
इसके बाद अपने ज्ञात-अज्ञात पितरों के लिए शांति और सद्गति की प्रार्थना करें।
महाभारत, आदिपर्व में अग्नि के माध्यम से देवताओं और पितरों को हवि पहुँचने की बात भी आती है:
अमावास्यां च पितरः पौर्णमास्यां च देवताः।
… भुञ्जते च हुतं हविः॥
अर्थात् अमावस्या पर पितरों के लिए और पूर्णिमा पर देवताओं के लिए आहुति का संबंध बताया गया है।
आज पितरों की कृपा प्राप्त करने के लिए घर पर ब्राह्मण को भोजन अवश्य ही कराएं एवं उसे यथा शक्ति दान – दक्षिणा प्रदान करें ।
अमावस्या के दिन घी, नमक, चावल, चीनी, आटा, सत्तू, काले तिल, अनाज, वस्त्र, आदि दक्षिणा के साथ योग्य ब्राह्मण को दान में अवश्य ही दें , ऐसा करने से पितरो का आशीर्वाद मिलता है ।
अमावस्या के दिन घर पर खीर अवश्य बनायें फिर उसमें थोड़ी सी खीर दोने पर निकाल कर पित्रों के निमित पीपल पर रख आएं ।
हर अमावस्या को गहरे गड्ढे या कुएं में एक चम्मच दूध डालें इससे कार्यों में बाधाओं का निवारण होता है ।
इसके अतिरिक्त अमावस्या को आजीवन जौ दूध में धोकर बहाएं, आपका भाग्य सदैव आपका साथ देगा ।
अमावस्या पर तुलसी के पत्ते या बिल्व पत्र बिलकुल भी नहीं तोडऩा चाहिए। अमावस्या पर देवी-देवताओं को तुलसी के पत्ते और शिवलिंग पर बिल्व पत्र चढ़ाने के लिए उन्हें एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।

नक्षत्र ( Nakshatra ) : पूर्वा फाल्गुनी 13.18 PM तक तत्पश्चात उत्तरा फाल्गुनी
नक्षत्र के स्वामी :– पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र के देवता भग (धन व ऐश्वर्य के देवता) और स्वामी शुक्र देव जी है ।
आकाश मंडल में पूर्वा फाल्गुनी को 11वां नक्षत्र माना जाता है। इस नक्षत्र का प्रतीक बिस्तर के सामने के दो पैर हैं जो आराम, अच्छे भाग्य का भी प्रतीक है।
यह नक्षत्र सुख, धन, कामुक प्रसन्नता, प्रेम और मनोरंजन को दर्शाता हैं। इस नक्षत्र काआराध्य वृक्ष : पलाश तथा स्वाभाव शुभ माना गया है। पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र सितारे का लिंग महिला है।
इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक पर जीवनभर सूर्य और शुक्र का प्रभाव बना रहता है।
पूर्वा फाल्गुनी में जन्मा जातक सुन्दर, विलासी, स्त्रियों का प्रिय, साहसी, चतुर, वाकपटु, खुले दिल वाला और घूमने फिरने का शौक़ीन होता है, इन्हे स्त्री और धन-संपत्ति का पूर्ण सुख मिलता है।
लेकिन यदि सूर्य और शुक्र शुभ नहीं है तो जातक बहुत कामुक, विलासी, धूर्त, घमंडी, जुए – सट्टे का लती और क्रोधी हो सकता है।
इस नक्षत्र में जन्म लेने वाली स्रियाँ धार्मिक, दयालु, आकर्षक, मिलनसार, आसानी से दूसरो को प्रभावित करने वाली, वैसी प्रवर्ति की होती है। यह आसानी से जीवन में सफलता प्राप्त कर लेती हैं।
पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र के लिए भाग्यशाली संख्या 9, भाग्यशाली रंग, चाकलेटी, हल्का भूरा, भाग्यशाली दिन शुक्रवार और रविवार माना जाता है ।
पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में जन्मे जातको को तथा जिस दिन यह नक्षत्र हो उस दिन सभी को “ॐ भगाय नमः”। मन्त्र का जाप अवश्य करना चाहिए ।
संकटो से रक्षा के लिए इस नक्षत्र के जातको को नित्य भगवान शंकर की आराधना करनी चाहिए । पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में जन्मे जातको को नित्य तथा जिस दिन यह नक्षत्र हो उस दिन माँ लक्ष्मी जी की आराधना से कभी भी धन की कमी नहीं होती है ।

योग(Yog) :- साध्य 17.02 PM तक तत्पश्चात शुभ
योग के स्वामी, स्वभाव :- साध्य योग की स्वामी देवी सावित्री जी और स्वभाव श्रेष्ठ माना जाता है ।
प्रथम करण : – नाग 08.56 AM तक
करण के स्वामी, स्वभाव :- नाग करण के स्वामी नागदेव और स्वभाव क्रूर है ।
द्वितीय करण :- किस्तुघ्न 20.17 PM तक तत्पश्चात बव
करण के स्वामी, स्वभाव :- किस्तुघ्न करण के स्वामी मरुत और स्वभाव क्रूर है ।
- दिशाशूल (Dishashool)- शुक्रवार को पश्चिम दिशा का दिकशूल होता है ।
- ब्रह्म मुहूर्त : 4.32 AM से 5.18 AM तक
- विजय मुहूर्त : 14.22 PM से 15.12 PM तक
- गोधूलि मुहूर्त : 18.31 PM से 18.54 PM तक
- अमृत काल : 07.05 AM से 20.37 AM तक
- अग्नि वास : आकाश में 08.56 AM तक तत्पश्चात पृथ्वी पर
अग्निवास जब आकाश में होता है तो उस समय हवन आदि करना अशुभ माना जाता है, इस समय हवन करने से हानि होती है ।
अग्निवास जब पृथ्वी पर होता है तो बहुत ही शुभ माना जाता है । शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी पर अग्निवास होने पर हवन आदि करने से सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है, मनवांछित लाभ मिलता है । - शिव वास : मां गौरी के साथ 08.56 AM तक तत्पश्चात शमशान में
जब भगवान शंकर गौरी मइय्या के साथ होते हैं, तो उस समय रुद्र अभिषेक करना बहुत ही शुभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार शंकर जी के देवी गौरी के साथ रहने के समय किये गए रूद्रअभिषेक से घर कारोबार में सुख-समृद्धि आती है, स्थाई लक्ष्मी का वास होता है ।
शिव वास श्मशान में – जब भगवान शिव का श्मशान में वास होता हैं, तो रुद्र अभिषेक आदि करना अशुभ माना जाता है। मान्यता है कि भगवान भोलेनाथ जी का श्मशान में वास के दौरान अभिषेक करने से मृत्यु समान परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
दिशा शूल : शास्त्रों के अनुसार शुक्रवार को पश्चिम दिशा में दिशा शूल होता है, यात्रा, कार्यों में सफलता के लिए घर से दही में चीनी या मिश्री डालकर उसे खाकर जाएँ । - गुलिक काल : – शुक्रवार का गुलिक प्रात: 7:30 से 9:00 तक ।
- राहुकाल (Rahukaal)– दिन – 10:30 AM से 12:00 PM तक ।
- सूर्योदय – प्रातः 06:04
- सूर्यास्त – सायं : 18:31
- विशेष – अमावस्या के दिन तुलसी के पत्ते, बिल्व पत्र या किसी भी तरफ के फूल पत्तो को बिलकुल भी नहीं तोडऩा चाहिए।
- अमावस्या, श्राद्ध और व्रत के दिन काँसे के बर्तन में भोजन करना, तिल का तेल का सेवन करना, सहवास करना निषिद्ध है ।
- पर्व त्यौहार– भाद्रपद माह की अमावस्या तिथि
- मुहूर्त (Muhurt) –
“हे आज की तिथि ( तिथि के स्वामी ), आज के वार, आज के नक्षत्र ( नक्षत्र के देवता और नक्षत्र के ग्रह स्वामी ), आज के योग और आज के करण, आप इस पंचांग को सुनने और पढ़ने वाले जातक पर अपनी कृपा बनाए रखे, इनको जीवन के समस्त क्षेत्रो में सदैव हीं श्रेष्ठ सफलता प्राप्त हो “।
आप का आज का दिन अत्यंत मंगल दायक हो ।
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आप का आज का दिन अत्यंत मंगल दायक हो ।
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