Shukrwar ka panchag, शुक्रवार का पंचांग, 27 फरवरी 2026 का पंचांग,


Shukrwar ka panchag, शुक्रवार का पंचांग, 27 फरवरी 2026 का पंचांग,

आप सभी भक्तो को रंग भरी एकादशी , आमलकी एकादशी की हार्दिक शुभकामनायें

गुरुवार का पंचांग शनिवार का पंचांग

शुक्रवार का पंचांग, Shukrwar ka panchag, 27 फरवरी 2026 का पंचांग का पंचांग,

शुक्रवार का पंचांग, shukrwar ka panchang,

  • Panchang, पंचाग, Panchang 2026 हिन्दू पंचाग, Hindu Panchang, पाँच अंगो के मिलने से बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं :-

    1:- तिथि (Tithi)
    2:- वार (Day)
    3:- नक्षत्र (Nakshatra)
    4:- योग (Yog)
    5:- करण (Karan)


    पंचाग (panchang) का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है इसीलिए भगवान श्रीराम भी नित्य पंचाग (panchang) का श्रवण करते थे ।

    जानिए, Shukravar Ka Panchang, शुक्रवार का पंचांग, आज का पंचांग, aaj ka panchang,

    27 फरवरी 2026 का पंचांग, 27 February  2026 ka Panchang,

  • महालक्ष्मी मन्त्र : ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥

  • ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥

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आज का पंचांग, aaj ka panchang,

दिन (वार) – शुक्रवार के दिन दक्षिणावर्ती शंख से भगवान विष्णु पर जल चढ़ाकर उन्हें पीले चन्दन अथवा केसर का तिलक करें। इस उपाय में मां लक्ष्मी जल्दी प्रसन्न हो जाती हैं।

शुक्रवार के दिन नियम पूर्वक धन लाभ के लिए लक्ष्मी माँ को अत्यंत प्रिय 
“श्री सूक्त”, “महालक्ष्मी अष्टकम” एवं समस्त संकटो को दूर करने के लिए “माँ दुर्गा के 32 चमत्कारी नमो का पाठ” अवश्य ही करें ।
शुक्रवार के दिन माँ लक्ष्मी को हलवे या खीर का भोग लगाना चाहिए ।

शुक्रवार के दिन शुक्र ग्रह की आराधना करने से जीवन में समस्त सुख, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, दाम्पत्य जीवन सुखमय होता है बड़ा भवन, विदेश यात्रा के योग बनते है।

  • * विक्रम संवत् – 2082 वर्ष
  • * शक संवत – 1947 वर्ष
    * कलि संवत – 5127 वर्ष
    * कलयुग – 5127 वर्ष
    * अयन – उत्तरायण,
    * ऋतु – बसंत ऋतु,
    * मास – फाल्गुन माह
    * पक्ष – शुक्ल पक्ष
    * चंद्र बल – वृषभ, कर्क, कन्या, तुला, मकर, कुम्भ,

शुक्रवार को शुक्र देव की होरा :-

प्रात: 6.48 AM से 7.49 AM तक

दोपहर 01.18 PM से 2.14 PM तक

रात्रि 19.59 PM से 21.06 PM तक

दाहिने हाथ के अंगूठे से नीचे के हिस्से ( शुक्र का स्थान ) और अंगूठे पर थोड़ा सा इत्र लगाकर, ( इत्र ना मिले तो उसके बिना भी कर सकते है) बाएं हाथ के अंगूठे से उस हिस्से को शुक्र की होरा में “ॐ शुक्राये नम:” या

ॐ द्रांम द्रींम द्रौंम स: शुक्राय नम:।’ मंत्र का अधिक से अधिक जाप करते हुए अधिक से अधिक रगड़ते / मसाज करते रहे ( कम से कम 10 मिनट अवश्य )I

यह उपाय आप कोई भी काम करते हुए चुपचाप कर सकते है इसके लिए किसी भी विधि विधान की कोई आवश्यकता नहीं है I

सुख समृद्धि, ऐश्वर्य, बड़ा भवन, विदेश यात्रा, प्रेम, रोमांस, सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए शुक्रवार की होरा अति उत्तम मानी जाती है ।

शुक्रवार के दिन शुक्र की होरा में शुक्रदेव देव के मंत्रो का जाप करने से कुंडली में शुक ग्रह मजबूत होते है, पूरे दिन शुभ फलो की प्राप्ति होती है ।

शुक्र देव के मन्त्र :-

ॐ शुं शुक्राय नमः।। अथवा

” ॐ द्राम द्रीम द्रौम सः शुक्राय नमः “।।

  • तिथि, (Tithi) एकादशी 22.32 PM तक तत्पश्चात द्वादशी, तिथि, (Tithi) :-,
  • तिथि के स्वामी – एकादशी तिथि के स्वामी विश्वदेव जी और द्वादशी तिथि के स्वामी भगवान श्री विष्णु जी है I

आज अति शुभ आमलकी एकादशी  /  रंग भरी एकादशी है ।  इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा-अर्चना और आंवले के दान से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

एकादशी तिथि का प्रारम्भ 26 फरवरी की देर रात अर्थात 27 फरवरी को 12:33 AM से होगा तथा एकादशी तिथि का समापन शुक्रवार 27 फरवरी की रात 10:32 PM पर होगा उदया तिथि के अनुसार एकादशी तिथि का ब्रत शुक्रवार 27 फरवरी को रखा जायेगा ।

शास्त्रों में आंवला को अमृत फल माना गया है, श्रेष्ठ स्थान दिया गया  है । मयता है कि भगवान श्री विष्णु जी ने जब सृष्टि की रचना के लिए भगवान ब्रह्मा जी को जन्म दिया उसी समय उन्होंने आंवले के वृक्ष को भी उत्पन्न किया था। आंवला विष्णु जी को अत्यंत प्रिय है, भगवान श्री हरि विष्णु जी ने आंवले को आदि वृक्ष के रूप में  बताया है ।

शास्त्रों में कहा गया है जो प्राणी विष्णु जी की पूर्ण कृपा, समस्त सुखो और अंत में स्वर्ग और मोक्ष  की कामना रखते हैं उन्हें फाल्गुन शुक्ल पक्ष की इस  एकादशी का व्रत अवश्य ही रखा चाहिए। इस एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष की पूजा से समस्त पापो का नाश होता है, सुख – समृद्धि, परम सौभाग्य और आरोग्य की प्राप्ति होती है। ।

आमलकी एकादशी को रंग भरी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है वर्ष की समस्त एकादशियों में यही ऐसी  एकादशी है जिसमें भगवान श्री विष्णु जी के साथ साथ भगवान भोलेनाथ जी की भी पूजा की जाती है।
रंग भरी एकादशी के दिन तीर्थ नगरी वाराणसी  में भगवान शंकर और माता पार्वती की विशेष पूजा की जाती है।

ऐसी मान्यता है कि इसी दिन भगवान शंकर माता पार्वती जी को गौना करा कर पहली बार वाराणसी लाये थे और काशीवासियों ने उनका स्वागत अत्यंत हर्ष से गुलाल उड़ा कर किया था और रंगो से होली खेली थी इसीलिए इसे रंग भरी एकादशी भी कहा जाता है  ।

इस दिन काशी में बाबा विश्वनाथ का विशेष रूप से श्रृंगार किया जाता है, भक्त उनकी पूजा में फूल और गुलाल का प्रयोग करते हैं ।
काशी में प्रत्येक वर्ष रंगभरी एकादशी पर भगवान शंकर और माँ पार्वती जी नगर भ्रमण करते हैं और पूरा नगर उनके दर्शनों के लिए लालायित रहता है, प्रत्येक काशी वासी रंगो से रंग जाता है ।

भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती की होली, काशी के लोगो की होली को देखने के लिए शिव भक्त बड़ी संख्या में दूर-दूर से आते हैं,   और अबीर गुलाल से सराबोर होकर होली की मस्ती में अपनी सुध बुध खो जाते है ।

काशी में होली में रंगो की शुरुआत इसी दिन से प्रारम्भ हो जाती है मान्यता है कि  इस एकादशी  में पूजा में  रंग और लाल गुलाल का अवश्य ही प्रयोग करना चाहिए ।  मान्यता है कि इस एकादशी के दिन भगवन शंकर जी पार्वती जी को अबीर – गुलाल और फूल अर्पित करने से दाम्पत्य जीवन सुखमय रहता है ।

शास्त्रों के अनुसार आंवले के पेड़ में तुलसी जी और बेल दोनों के ही  गुण होते हैं, और आंवले के पेड़ की पूजा करने, धूप – दीप जलाने, चुनरी अर्पित करने से श्री विष्णु जी और भगवान शंकर जी दोनों की ही पूजा का फल मिलता है।

एकादशी के दिन विष्णु जी को अत्यंत प्रिय तुलसी जी की भी पूजा अवश्य ही करनी चाहिए, ऐसा करने से अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है ।

एकादशी के दिन भगवान विष्णु जी के मन्त्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” अथवा ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।। का आशिक से अधिक जाप करना चाहिए ।

एकादशी के दिन जल में आँवले का चूर्ण या आँवले का रस डाल कर स्नान करने से समस्त पापो का नाश होता है।

एकादशी के दिन रात्रि में भगवान विष्णु के सामने नौ बत्तियों का दीपक जलाएं और एक दीपक ऐसा जलाएं जो रात भर जलता रहे।  

एकादशी के दिन चावल और दूसरे का अन्न खाना मना है । एकादशी के दिन चावल खाने से रोग और पाप बढ़ते है, एकादशी के दिन दूसरे का अन्न खाने से समस्त पुण्यों का नाश हो जाता है ।

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नक्षत्र ( Nakshatra ) : आद्रा 10.48 AM तक तत्पश्चात पुनर्वसु,

नक्षत्र के स्वामी :–     आर्द्रा नक्षत्र के देवता रुद्र (शिव) और नक्षत्र के स्वामी राहु जी है ।  

आर्द्रा नक्षत्र आकाश मंडल में छठवां नक्षत्र है। यह मिथुन राशि में आता है और राहु का नक्षत्र है। आर्द्रा नक्षत्र कई तारों का समूह न होकर केवल एक तारा है। इसका आकार हीरे अथवा वज्र अथवा आँसू की तरह है।

आद्रा नक्षत्र का आराध्य वृक्ष कृष्णागरू,काला तेंदू और नक्षत्र स्वभाव तीक्ष्ण माना गया है ।

आर्द्रा नक्षत्र आकाश मंडल में छठवां नक्षत्र है। यह मिथुन राशि में आता है और राहु का नक्षत्र है। आर्द्रा नक्षत्र कई तारों का समूह न होकर केवल एक तारा है। इसका आकार हीरे अथवा वज्र अथवा आँसू की तरह है।

आर्द्रा नक्षत्र का आराध्य वृक्ष कृष्णागरू,काला तेंदू और नक्षत्र स्वभाव तीक्ष्ण माना गया है ।

आर्द्रा नक्षत्र में जन्मे जातको पर राहु का प्रभाव रहता है अत: इन्हे राहु का उपाय अवश्य करना चाहिए । इन्हे अनैतिक कार्यो से सदैव दूर रहना चाहिए अन्यथा इन्हे अपमान अपयश का सामना करना पड़ सकता है ।

आर्द्रा नक्षत्र के पुरुष हंसमुख, जिम्मेदार, आकर्षक व्यक्तित्व वाले, नए नए खोजो वाले लेकिन चालाक और अपना काम निकलने वाले होते है। लेकिन यदि बुध और रा‍हु खराब हो तो जातक घमंडी, बुरे विचारों वाले, पराई स्त्री में आसक्त रहने वाले, दुखी स्वाभाव वाले भी होते हैं।

आर्द्रा नक्षत्र में पैदा हुई महिला बुद्विमान, व्यवहार कुशल और शांतिप्रिय होती हैं। यह खूब खर्चा करने वाली, लेकिन हमेशा मीन मेख निकालने वाली भी होती है।

समान्यता इनके माता-पिता में बहुत ही अनबन रहती है, अर्थात इन्हे घर में कलह देखना पड़ता है।

आर्द्रा नक्षत्र के लिए भाग्यशाली संख्या 2, 4, 7 और 9, भाग्यशाली रंग, लाल और बैंगनी,  भाग्यशाली दिन मंगलवार तथा गुरुवार का माना जाता है ।

आद्रा नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातको को तथा सभी मनुष्यों को जिस दिन आर्द्रा नक्षत्र हो उस दिन ॐ रुद्राय नम: मन्त्र की एक माला का जप करना चाहिए, इससे आर्द्रा नक्षत्र के शुभ फल मिलते है ।  

आर्द्रा नक्षत्र के जातक के लिए भगवान शिव की आराधना करना शुभदायक होता है।  भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का जाप करना चाहिए. सोमवार का व्रत एवं जाप इत्यादि करना उत्तम फल प्रदान करने वाला होता है। 

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योग(Yog) :- आयुष्मान 19.44 PM तक तत्पश्चात सौभाग्य

योग के स्वामी, स्वभाव :-       आयुष्मान योग के स्वामी चंद्र देव एवं स्वभाव श्रेष्ठ माना जाता है । 

प्रथम करण : – वणिज 11.31 AM तक

करण के स्वामी, स्वभाव :-   वणिज करण की स्वामी लक्ष्मी देवी और स्वभाव सौम्य है ।

द्वितीय करण :- विष्टि 22.32 PM तक तत्पश्चात बव

करण के स्वामी, स्वभाव :-     विष्टि करण के स्वामी यम और स्वभाव क्रूर है ।

  • दिशाशूल (Dishashool)- शुक्रवार को पश्चिम दिशा का दिकशूल होता है ।
  • ब्रह्म मुहूर्त : 5.09 AM से 5.59 AM तक
  • विजय मुहूर्त : 14.29 PM से 15.15 PM तक
  • गोधूलि मुहूर्त : 18.17 PM से 18.42 PM तक
  • अमृत काल : 15.28 PM से 17.01 PM

    यात्रा, कार्यों में सफलता के लिए घर से दही में चीनी या मिश्री डालकर उसे खाकर जाएँ ।
  • गुलिक काल : – शुक्रवार का गुलिक प्रात: 7:30 से 9:00 तक ।
  • राहुकाल (Rahukaal)-दिन – 10:30 AM से 12:00 PM तक ।
  • सूर्योदय – प्रातः 06:48
  • सूर्यास्त – सायं : 18:20
  • विशेष – एकादशी के दिन सेम फली, चावल का सेवन और दूसरो के अन्न का सेवन नहीं करना चाहिए ।
  •  एकादशी के दिन चावल खाने से रोग बढ़ते है और दूसरे का अन्न खाने से पुण्य नष्ट होते है ।
  • पर्व त्यौहार- रंग भरी एकादशी, आमलकी एकादशी

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“हे आज की तिथि ( तिथि के स्वामी ), आज के वार, आज के नक्षत्र ( नक्षत्र के देवता और नक्षत्र के ग्रह स्वामी ), आज के योग और आज के करण, आप इस पंचांग को सुनने और पढ़ने वाले जातक पर अपनी कृपा बनाए रखे, इनको जीवन के समस्त क्षेत्रो में सदैव हीं श्रेष्ठ सफलता प्राप्त हो “।
आप का आज का दिन अत्यंत मंगल दायक हो ।

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आप का आज का दिन अत्यंत मंगल दायक हो ।

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Shukrwar ka panchag, शुक्रवार का पंचांग, 27 फरवरी 2026 का पंचांग, आप सभी भक्तो को रंग भरी एकादशी ,   आमलकी एकादशी की हार्दिक शुभकामनायें गुर...