मंगलवार का पंचांग, Mangalwar Ka Panchang, 13 जनवरी 2026 का पंचांग,
आप सभी को सुख – समृद्धि, हर्ष – उल्लास के पर्व लोहिड़ी की हार्दिक शुभकामनायें
मंगलवार का पंचांग, Mangalwar Ka Panchang,
Panchang, पंचाग, ( Panchang 2026, हिन्दू पंचाग, Hindu Panchang ) पाँच अंगो के मिलने से बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं :-
1:- तिथि (Tithi)
2:- वार (Day)
3:- नक्षत्र (Nakshatra)
4:- योग (Yog)
5:- करण (Karan)
पंचाग (panchang) का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है इसीलिए भगवान श्रीराम भी पंचाग (panchang) का श्रवण करते थे ।
जानिए मंगलवार का पंचांग (Mangalvar Ka Panchang)।
शास्त्रों के अनुसार तिथि के पठन और श्रवण से माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है ।
वार के पठन और श्रवण से आयु में वृद्धि होती है।
नक्षत्र के पठन और श्रवण से पापो का नाश होता है।
योग के पठन और श्रवण से प्रियजनों का प्रेम मिलता है। उनसे वियोग नहीं होता है ।
*करण के पठन श्रवण से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है ।
इसलिए हर मनुष्य को जीवन में शुभ फलो की प्राप्ति के लिए नित्य पंचांग को देखना, पढ़ना चाहिए ।
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13 जनवरी 2026 का पंचांग, 13 January 2026 ka panchang,
हनुमान जी का मंत्र : हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट् ।
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।। आज का दिन मंगलमय हो ।।
- दिन (वार) – मंगलवार Mangalwar के दिन क्षौरकर्म अर्थात बाल, दाढ़ी काटने या कटाने से उम्र कम होती है। अत: इस दिन बाल और दाढ़ी नहीं कटवाना चाहिए ।
मंगलवार Mangalwar को हनुमान जी की पूजा और व्रत करने से हनुमान जी प्रसन्न होते है। मंगलवार के दिन हनुमान चालीसा एवं सुन्दर काण्ड का पाठ करना चाहिए।
मंगलवार को यथासंभव मंदिर में हनुमान जी के दर्शन करके उन्हें लाल गुलाब, इत्र अर्पित करके बूंदी / लाल पेड़े या गुड़ चने का प्रशाद चढ़ाएं । हनुमान जी की पूजा से भूत-प्रेत, नज़र की बाधा से बचाव होता है, शत्रु परास्त होते है।
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मंगलवार के व्रत से सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है, बल, साहस और सम्मान में भी वृद्धि होती है।
मंगलवार को धरती पुत्र मंगलदेव की आराधना करने से जातक को मुक़दमे, राजद्वार में सफलता मिलती है, उत्तम भूमि, भवन का सुख मिलता है, मांगलिक दोष दूर होता है।
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*विक्रम संवत् 2082,
*शक संवत – 1947
*कलि सम्वत 5127
*अयन – दक्षिणयायन
*ऋतु – शरद ऋतु
*मास – माघ माह,
*पक्ष – कृष्ण पक्ष
*चंद्र बल – वृषभ, मिथुन, कन्या, वृश्चिक, कुम्भ, मीन,
मंगलवार को मंगल की होरा :-
प्रात: 7.11 AM से 7.58 AM तक
दोपहर 01.05 PM से 1.59 PM तक
रात्रि 19.47 PM से 21.01 PM तक
मंगलवार को मंगल की होरा में हाथ की निम्न मंगल पर दो बूंद सरसो का तेल लगा कर उसे हल्के हल्के रगड़ते हुए अधिक से अधिक मंगल देव के मन्त्र का जाप करें ।
कृषि, भूमि, भवन, इंजीनियरिंग, खेलो, साहस, आत्मविश्वास
और भाई के लिए मंगल की होरा अति उत्तम मानी जाती है ।
मंगलवार के दिन मंगल की होरा में मंगल देव के मंत्रो का जाप करने से कुंडली में मंगल मजबूत होते है, पूरे दिन शुभ फलो की प्राप्ति होती है ।

मंगल देव के मन्त्र
ॐ अं अंगारकाय नम: अथवा
ॐ भौं भौमाय नम:”
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तिथि :- दशमी 15.17 PM तक तत्पश्चात एकादशी,
तिथि के स्वामी :- दशमी तिथि के स्वामी यमराज जी और एकादशी तिथि के स्वामी विश्वदेव जी है ।
दशमी तिथि के देवता यमराज जी हैं। यह दक्षिण दिशा के स्वामी है। इनका निवास स्थान यमलोक है। शास्त्रों के अनुसार यमराज जी मृत्यु के देवता कहे गए हैं।
गरुड़ पुराण के अनुसार यमराज के महल को कालित्री महल कहते हैं और उनके सिंहासन को विचार-भू कहते हैं।
पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है कि यमलोक पृथ्वी से 86,000 योजन यानी करीब 12 लाख किलोमीटर दूर है।
गरुड़ पुराण में यमलोक में चार द्वार बताए गए हैं। पूर्वी द्वारा से प्रवेश सिर्फ धर्मात्मा और पुण्यात्माओं को मिलता है जबकि दक्षिण द्वार से पापियों का प्रवेश होता है जिसे यमलोक में यातनाएं भुगतनी पड़ती है।
साधु-संतों को उत्तर दरवाजे से और दान पुण्य करने वाले मनुष्यों को पश्चिम द्वार से प्रवेश मिलता है।
यमराज जी भगवान सूर्य और उनकी पत्नी संज्ञा के पुत्र है, यमुना अर्थात (यमी) इनकी जुड़वां बहन और मनु इनके भाई कहे गए है।
यमराज की पत्नी का नाम देवी धुमोरना तथा इनके पुत्र का नाम कतिला है।
यमराज जी का वाहन महिष / भैंसे को माना गया हैं। वे समस्त जीवों के शुभ अशुभ कर्मों का निर्णय करते हैं।
इस दिन इनकी पूजा करने, इनसे अपने पापो के लिए क्षमा माँगने से जीवन की समस्त बाधाएं दूर होती हैं, निश्चित ही सभी रोगों से छुटकारा मिलता है, नरक के दर्शन नहीं होते है अकाल मृत्यु के योग भी समाप्त हो जाते है।
मथुरा में स्थित यमराज और उनकी बहन यमुना जी का एक प्राचीन मंदिर है उस मंदिर को यमुना धर्मराज मंदिर कहते है। देश में भाई-बहन का ये एकमात्र मंदिर है।
मान्यता है कि, भाई बहन इस मंदिर में भैया दूज के दिन एक साथ स्नान करते हैं। इससे उन्हें मृत्यु के बाद बैकुंठ की प्राप्ति होती है।
इस तिथि को धर्मिणी भी कहा गया है। समान्यता यह तिथि धर्म और धन प्रदान करने वाली मानी गयी है ।
दशमी तिथि में नया वाहन खरीदना शुभ माना गया है। इस तिथि को सरकार से संबंधी कार्यों का आरम्भ किया जा सकता है।
यमराज जी का समस्त रोगों को बाधाओं को दूर करने वाले मन्त्र :- “ॐ क्रौं ह्रीँ आं वैवस्वताय धर्मराजाय भक्तानुग्रहकृते नम : “॥ की एक माला का जाप अथवा कम से कम 21 बार इस मन्त्र का जाप करें ।
दशमी को परवल नहीं खाना चाहिए।
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प्रत्येक वर्ष 13 जनवरी को हर्ष, उल्लास का पवित्र पर्व लोहिड़ी का पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। यह लोहड़ी का त्यौहार पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू काश्मीर, हिमांचल प्रदेश के साथ साथ उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और लगभग पूरे उत्तर भारत में में धूम धाम के साथ मनाया जाता हैं।
समान्यता यह पर्व मकर संक्रांति से एक या दो दिन पहले पड़ता है।
लोहड़ी पंजाबियों का बहुत बड़ा त्यौहार है, लोहड़ी का पर्व परिवार के सभी सदस्यों, रिश्तेदारों और दोस्तों को एक साथ एक ही स्थान पर लाता है।
इस पर्व में सूर्यास्त के बाद खुले स्थान पर कंडे, लकड़ियों का ढेर बना कर उसकी पूजा करके आग लगाई जाती है। इसमें प्रत्येक परिवार अग्नि की परिक्रमा करता है, और अग्नि देव से अपने परिवार की सुख समृद्धि के लिए आशीर्वाद प्राप्त करते है।
परिक्रमा करते समय अग्नि में रेवड़ी, मक्की के भुने दाने, मूँगफली आदि अग्नि की भेंट किए जाते हैं तथा प्रसाद के रूप में ये ही चीजें सभी उपस्थित लोगों को बाँटी जाती हैं। घर लौटते समय ‘लोहड़ी’ में से दो चार दहकते कोयले, प्रसाद के रूप में, घर पर लाने की प्रथा भी है।
जिन परिवारों में लड़के का विवाह होता है अथवा जिन्हें पुत्र प्राप्ति होती है, उनके यहाँ की पहली लोहड़ी का उल्लास देखते ही बनता है। उस दिन सभी रिश्तेदार, परिचित और मित्र आदि एक जगह इकट्ठे होकर उन्हें आशीर्वाद देंते है ।
इस दिन सभी लोग सुन्दर और रंग बिरंगे कपडे पहनते है, वहाँ पर लोग ढोल की थाप पर थिकरते हुए गिद्दा और भांगड़ा करते हुए लोहड़ी का पर्व मनाते हैं।
यह प्रसिद्ध पर्व किसानों के लिए बहुत महत्व रखता है। लोहडी का त्योहार किसानों के लिए एक नयी समृद्धशाली शुरुआत का प्रतीक है।
लोहडी का त्योहार किसानों के लिए एक नयी समृद्धशाली शुरुआत का प्रतीक है। लोहडी का त्यौहार नविवाहित जोडे और घर मे जन्मे पहले बच्चे के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस दिन परिवार के बड़े सदस्य, छोटे सदस्यों और स्त्रियों को लोहड़ी ( उपहार / नकद ) देते है । लोहड़ी के दिन पंजाबी लोक संगीत भांगडा और गिद्दा की हर तरफ धूम होती है ।
- नक्षत्र (Nakshatra) – अश्वलेशा 12.17 PM तक तत्पश्चात मघा
- नक्षत्र के देवता, ग्रह स्वामी – अश्लेषा नक्षत्र के देवता सर्प देव एवं नक्षत्र के स्वामी बुध देव जी है ।
अश्लेषा नक्षत्र का स्थान आकाश मंडल के नक्षत्रो में 9 वां है। यह कर्क राशि के अंतर्गत आता है। अश्लेशा नक्षत्र के देवता सर्प देव एवं नक्षत्र के स्वामी बुध देव जी है।
अश्लेषा नक्षत्र को गण्ड मूल नक्षत्र कहते है। अश्लेषा नक्षत्र में चंद्रमा की ऊर्जा और सर्प देवता की ताकत है। यह एक कुंडलित सर्प जैसा दिखता है जो कुंडलिनी ऊर्जा का प्रतीक है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वालों पर जीवनभर बुध व चन्द्र का प्रभाव पड़ता है।
अश्लेषा नक्षत्र सितारा का लिंग महिला है। अश्लेषा नक्षत्र का आराध्य वृक्ष: नागकेसर, तथा स्वाभाव तीक्ष्ण, शोक वाला होता है ।
अश्लेषा नक्षत्र में जन्मे जातक हंसमुख, वाकपटु, साहित्य तथा संगीत प्रेमी, नेतृत्वशील, यशवान और सफल व्यापारी होते है इन्हे पूर्ण पारिवारिक सुख प्राप्त होता है।
लेकिन कुंडली में बुध और चन्द्र खराब स्थिति में होने पर जातक चालाक, क्रोधी- क्रूर स्वभाव, बेकार के कामो में धन को गंवाने वाला, कामुक विचारो वाला,आलसी, स्वार्थी, निराशवादी, कभी-कभार चोरी करने वाला भी होता है ।
अश्लेशा नक्षत्र गंड नक्षत्र है अतः व्यक्ति की आयु कम होती है, इसलिए अश्लेशा नक्षत्र का पूर्ण विधि विधान से शांति करवाना आवश्यक होता है. ।
अश्लेषा नक्षत्र के लिए भाग्यशाली संख्या 5 और 9, भाग्यशाली रंग काला – लाल, भाग्यशाली दिन बुधवार होता है । इन्हे नागकेसर के पौधे की सेवा करनी चाहिए तथा घर पर नाग केसर को रखना चाहिए ।
अश्लेषा नक्षत्र में जन्मे जातको को नित्य तथा अन्य सभी को आज “ॐ सर्पेभ्यो नमःl “ मन्त्र की एक माला का जाप अवश्य करना चाहिए।
- योग :- शूल 19.05 PM तक तत्पश्चात गण्ड
- योग के स्वामी :- शूल योग के स्वामी सर्प एवं स्वभाव हानिकारक है । ।
- प्रथम करण : – विष्टि 15.17 PM तक
- करण के स्वामी, स्वभाव :- विष्टि करण के स्वामी यम और स्वभाव क्रूर है ।
- द्वितीय करण : – बव 04.36 AM गुरुवार 14 जनवरी तक
- करण के स्वामी, स्वभाव :- बव करण के स्वामी इंद्र देव और स्वभाव सौम्य है ।
- ब्रह्म मुहूर्त : 05.27 AM से 6.21 AM तक
- विजय मुहूर्त : 14.15 PM से 14.57u PM तक
- गोधूलि मुहूर्त : 17.42 PM से 18.09 PM तक
- अमृत काल : 14.12 PM से 16.00 PM तक
- दिशाशूल (Dishashool)- मंगलवार को उत्तर दिशा का दिकशूल होता है।
यात्रा, कार्यों में सफलता के लिए घर से गुड़ खाकर जाएँ । - गुलिक काल : – दोपहर 12:00 से 01:30 तक है ।
- राहुकाल (Rahukaal) दिन – 3:00 से 4:30 तक।
- सूर्योदय – प्रातः 07:12
- सूर्यास्त – सायं 17:45
- विशेष –दशमी के दिन कलम्बी, परवल का सेवन नहीं करना चाहिए ।
- पर्व – त्यौहार- लोहड़ी
“हे आज की तिथि (तिथि के स्वामी), आज के वार, आज के नक्षत्र (नक्षत्र के देवता और नक्षत्र के ग्रह स्वामी ), आज के योग और आज के करण, आप इस पंचांग को सुनने और पढ़ने वाले जातक पर अपनी कृपा बनाए रखे, इनको जीवन के समस्त क्षेत्रो में सदैव हीं श्रेष्ठ सफलता प्राप्त हो “।
आप का आज का दिन अत्यंत मंगल दायक हो ।
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